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Reading: स्वतंत्र फिल्मों के लिए सिनेमाघरों में घटती जगह पर फिल्म निर्माताओं का विरोध तेज, 46 क्रिएटर्स ने जारी किया संयुक्त बयान
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The Hill India > Blog > होम > बॉलीवुड > स्वतंत्र फिल्मों के लिए सिनेमाघरों में घटती जगह पर फिल्म निर्माताओं का विरोध तेज, 46 क्रिएटर्स ने जारी किया संयुक्त बयान
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स्वतंत्र फिल्मों के लिए सिनेमाघरों में घटती जगह पर फिल्म निर्माताओं का विरोध तेज, 46 क्रिएटर्स ने जारी किया संयुक्त बयान

The Hill India News
Last updated: November 18, 2025 1:46 am
The Hill India News
Published: November 18, 2025
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नई दिल्ली, 18 नवंबर: भारतीय स्वतंत्र फिल्मों को थिएटरों में सीमित स्क्रीन टाइम मिलने के खिलाफ अब क्रिएटर्स एकजुट हो गए हैं। देश के 46 प्रमुख स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं—जिनमें पायल कपाड़िया, वरुण ग्रोवर, अनुपर्णा रॉय और वासन बाला जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित नाम शामिल हैं—ने रविवार को एक संयुक्त बयान जारी कर सिनेमाघरों तक अपनी फिल्मों की निष्पक्ष और समान पहुंच की मांग की है।

Contents
“हम बस चाहते हैं कि हमारी फिल्में देखी जाएँ” — संयुक्त बयानबॉक्स ऑफिस पर बड़े बजट की फिल्में हावी, स्वतंत्र फिल्मों की स्क्रीन घटतीस्वतंत्र सिनेमा: अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शनथिएटर मालिकों और फिल्म संघों से अपीलफिल्म इंडस्ट्री में चर्चा तेजअंत में — ‘स्क्रीन स्पेस’ की लड़ाई और तेज होने की संभावना

निर्माताओं का कहना है कि भारत में इंडस्ट्री का व्यावसायिक मॉडल मुख्यधारा की फिल्मों को प्राथमिकता देता है, जिसके चलते स्वतंत्र फिल्मों के लिए जगह लगातार घटती जा रही है, जबकि इन्हीं फिल्मों को वैश्विक मंचों पर भारतीय कहानी कहने की असल पहचान माना जा रहा है।


“हम बस चाहते हैं कि हमारी फिल्में देखी जाएँ” — संयुक्त बयान

फिल्म निर्माताओं ने अपने बयान में कहा,
“हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि हमारी फिल्मों को भी सिनेमाघरों में जगह मिले। हमारी फिल्मों को विश्व स्तर पर सराहा गया है क्योंकि वे भारतीय कहानियों की सच्ची आत्मा को आगे बढ़ाती हैं। लेकिन भारत में इन्हें प्लेटफॉर्म ही नहीं मिल रहा।”

निर्माताओं का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारतीय स्वतंत्र सिनेमा की धूम है, पर घरेलू सर्किट में उन्हें दर्शकों तक पहुँचने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।


बॉक्स ऑफिस पर बड़े बजट की फिल्में हावी, स्वतंत्र फिल्मों की स्क्रीन घटती

भारत में मल्टीप्लेक्स संस्कृति बढ़ने के बावजूद थिएटर चेन अक्सर केवल बड़े सितारों या बड़े बैनर वाली फिल्मों को अधिक शोज़ देते हैं।
फिल्ममेकरों की शिकायत है कि—

  • छोटे बजट की फिल्मों को स्क्रीन कम मिलती हैं
  • शो टाइम ऐसे दिए जाते हैं जब दर्शक कम होते हैं
  • कई स्वतंत्र फिल्मों को पूरे देश में दो–चार शहरों तक ही सीमित कर दिया जाता है

इस असमानता के कारण भारतीय स्वतंत्र सिनेमा का वह दर्शक आधार कमजोर पड़ रहा है जो OTT से पहले थिएटरों में ही विकसित होता था।


स्वतंत्र सिनेमा: अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय स्वतंत्र फिल्मों ने वैश्विक स्तर पर कई सम्मान हासिल किए हैं—

  • पायल कपाड़िया की फिल्में कान और अन्य अंतरराष्ट्रीय समारोहों में प्रशंसा पा चुकी हैं
  • वरुण ग्रोवर, वासन बाला और अन्य निर्देशक अपनी क्रिएटिव दृष्टि और प्रयोगधर्मी कहानी कहने के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं

निर्माताओं का कहना है कि ऐसे समय में जब भारतीय स्वतंत्र कहानियाँ ग्लोबल ऑडियंस को आकर्षित कर रही हैं, देश के भीतर इन्हें थिएट्रिकल सपोर्ट मिलना आवश्यक है।


थिएटर मालिकों और फिल्म संघों से अपील

संयुक्त बयान में फिल्म निर्माताओं ने—

  • सिनेमाघर मालिकों
  • डिस्ट्रीब्यूटर्स
  • फिल्म फेडरेशंस
  • और सरकार

से अनुरोध किया है कि वे स्वतंत्र फिल्मों के लिए स्क्रीन आवंटन की पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था बनाएं।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि भारत सिनेमा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करना चाहता है, तो घरेलू प्रदर्शन ढांचे को लोकतांत्रिक बनाना ही होगा।


फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा तेज

इस सामूहिक बयान के बाद फिल्म उद्योग में बहस छिड़ गई है। कुछ निर्माताओं का मानना है कि OTT प्लेटफॉर्म्स ने विकल्प दिया है, लेकिन थिएट्रिकल रिलीज का महत्व आज भी बरकरार है क्योंकि—

  • थिएटर फिल्म की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा तय करते हैं
  • इंडस्ट्री में डायरेक्टर्स और राइटर्स की पहचान थिएटर से मजबूत होती है
  • थिएट्रिकल प्रदर्शन पब्लिक डिस्कोर्स और बॉक्स ऑफिस मैट्रिक्स के लिए जरूरी है

अंत में — ‘स्क्रीन स्पेस’ की लड़ाई और तेज होने की संभावना

स्वतंत्र फिल्मकारों का यह एकजुट होकर सामने आना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत माना जा रहा है।
एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तेज हो सकता है क्योंकि भारत में विविध और प्रायोगिक सिनेमा के लिए सिनेमाघरों में जगह लगातार सिकुड़ रही है।

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