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राजद का आरोप – बिहार सरकार ने आचार संहिता के दौरान महिलाओं को किया भुगतान, चुनाव आयोग से की शिकायत

मनोज झा बोले – ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के नाम पर 17, 24 और 31 अक्टूबर को धन अंतरित किया गया, अगला भुगतान मतदान से ठीक पहले तय’

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर: राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बिहार में लागू आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाते हुए शुक्रवार को चुनाव आयोग को औपचारिक शिकायत सौंपी है। पार्टी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने आयोग को लिखे पत्र में दावा किया है कि बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 17, 24 और 31 अक्टूबर को राज्य की महिलाओं के खातों में धनराशि अंतरित की है — जो आचार संहिता के लागू होने के बाद किया गया है।

झा ने कहा कि यह कार्रवाई न केवल आदर्श आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है, बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास भी है। उन्होंने निर्वाचन आयोग से तत्काल संज्ञान लेने, विस्तृत जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।


‘अगला भुगतान मतदान से ठीक पहले प्रस्तावित’

राजद नेता मनोज झा ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि इस योजना के तहत अगला भुगतान 7 नवंबर को निर्धारित है — जो बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान से ठीक चार दिन पहले है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की वित्तीय गतिविधियाँ चुनाव प्रक्रिया को “प्रभावित और पक्षपातपूर्ण” बना सकती हैं।

“बिहार सरकार की ओर से इस योजना के तहत आचार संहिता लागू होने के बाद तीन बार धन का हस्तांतरण किया गया है। अब चौथा भुगतान मतदान से महज कुछ दिन पहले तय किया गया है। यह साफ तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास है,” — मनोज झा ने लिखा।


मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना क्या है?

‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ बिहार सरकार की एक राज्य स्तरीय पहल है, जिसके तहत महिलाओं को स्वरोजगार और उद्यमिता से जोड़ने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
इस योजना के अंतर्गत योग्य लाभार्थियों को चरणबद्ध तरीके से राशि सीधे उनके बैंक खातों में जमा की जाती है।

सरकार का दावा है कि योजना का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।
हालांकि, आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी नई योजना की घोषणा, भुगतान या प्रचार चुनाव आयोग की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे मतदाताओं को प्रभावित करने वाला कदम माना जाता है।


राजद का आरोप: ‘चुनावी लाभ लेने की कोशिश’

राजद ने इस कार्रवाई को “प्रशासनिक संसाधनों के दुरुपयोग” की संज्ञा दी है।
मनोज झा ने पत्र में लिखा कि सरकार जानबूझकर इस योजना के तहत भुगतान की तिथियाँ ऐसी तय कर रही है, जिससे चुनावी लाभ लिया जा सके।

उन्होंने कहा —

“यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए घातक है। सरकारी मशीनरी का उपयोग यदि किसी विशेष राजनीतिक दल के हित में किया जा रहा है, तो यह मतदाता की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव की भावना पर आघात है।”

राजद ने आयोग से मांग की है कि वह तुरंत इस योजना के तहत सभी वित्तीय हस्तांतरणों पर रोक लगाए, और यह सुनिश्चित करे कि चुनाव अवधि के दौरान कोई भी लाभांश भुगतान न हो।


चुनाव आयोग से निष्पक्षता बनाए रखने की अपील

राजद सांसद ने निर्वाचन आयोग से आग्रह किया कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए इस मामले में त्वरित कार्रवाई करे।
उन्होंने कहा कि भारत का संविधान और चुनाव आयोग की संहिता यह सुनिश्चित करती है कि चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी और बराबरी के अवसरों के साथ हों।

“हमारा निवेदन है कि आयोग न केवल इस विशेष मामले की जांच करे, बल्कि सभी योजनाओं के तहत जारी भुगतानों की समीक्षा भी करे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ दोबारा न हों,” झा ने लिखा।


बिहार सरकार की ओर से प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा

बिहार सरकार की ओर से इस आरोप पर फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
राज्य के वित्त विभाग और महिला विकास निदेशालय के सूत्रों ने बताया कि “योजना की किश्तें पूर्व-निर्धारित कैलेंडर के अनुसार दी जा रही हैं” और “इसका चुनावी प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है।”

हालांकि, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि योजना के भुगतान की तिथियाँ अक्टूबर और नवंबर में तय हैं।
सरकार का तर्क है कि यह रूटीन प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसे रोकने से गरीब महिलाओं की आजीविका प्रभावित हो सकती है।


विशेषज्ञों का मत: ‘टाइमिंग से उठते हैं सवाल’

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी सरकारी योजना के तहत धन हस्तांतरण आचार संहिता लागू होने के बाद होता है, तो आयोग को यह तय करना होता है कि भुगतान पूर्वनिर्धारित था या चुनावी प्रभाव के लिए किया गया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने एक टीवी चैनल को बताया —

“अगर योजना पहले से चल रही है और उसकी भुगतान तिथियाँ पहले से तय थीं, तो सरकार को यह साबित करना होगा कि भुगतान चुनाव की घोषणा से पहले अनुमोदित थे। अन्यथा, इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में आयोग आमतौर पर एक रिपोर्ट मांगता है, और यदि उल्लंघन पाया जाता है, तो सरकार से तुरंत रोक लगाने या स्पष्टीकरण देने के निर्देश देता है।


बिहार चुनाव का परिप्रेक्ष्य

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण का मतदान हाल ही में सम्पन्न हुआ है, जबकि दूसरा चरण 11 नवंबर को होना है। राज्य में राजनीतिक माहौल बेहद गर्म है, और लगभग सभी दल महिलाओं को अपने वोट बैंक के रूप में मजबूत करने की कोशिश में हैं।

राजद जहां सरकार पर “प्रशासनिक पक्षपात” का आरोप लगा रही है, वहीं सत्तारूढ़ जेडीयू और भाजपा गठबंधन इसे “राजनीतिक हताशा से उपजा आरोप” बता रहे हैं।
एक जेडीयू प्रवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —

“सरकार की योजनाएँ जनता के लिए हैं, किसी दल के लिए नहीं। चुनाव के समय हर सरकारी काम रुक नहीं सकता। लेकिन हम आयोग के दिशानिर्देशों का पूरा पालन करेंगे।”


राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला

यह विवाद उस समय सामने आया है जब बिहार में महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक सशक्तिकरण को लेकर कई योजनाएँ राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं।
नीतीश कुमार सरकार पहले भी ‘मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना’ और ‘जीविका परियोजना’ के जरिए महिलाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देती रही है।

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि ऐसी योजनाएँ राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक प्रभावशाली होती हैं, इसलिए इनके क्रियान्वयन का समय और तरीका हमेशा जांच के दायरे में आता है।

राजद द्वारा उठाया गया यह मुद्दा अब चुनाव आयोग के पाले में है। यदि आयोग इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानता है, तो बिहार सरकार को इस योजना के तहत आगे के भुगतान पर रोक लगानी पड़ सकती है।
फिलहाल, आयोग की प्रतिक्रिया और जांच रिपोर्ट का इंतजार है।

इस बीच, चुनावी तापमान बढ़ने के साथ यह मामला बिहार की सियासत में एक नया मोर्चा खोलता दिख रहा है — जहाँ “विकास बनाम वोट बटोरने की रणनीति” की बहस अब और तेज़ हो सकती है।

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