नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अवैध प्रवासियों के निर्वासन को लेकर केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ‘पुश-बैक सर्कुलर’ पर स्पष्टीकरण देने के लिए केंद्र को एक सप्ताह का समय दिया है। हालांकि, अदालत ने इस सर्कुलर पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है, जिसके चलते बंगाली भाषी मुसलमानों के कथित निर्वासन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।
“पंजाब और बंगाल की भाषा-संस्कृति सीमापार जैसी”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि पंजाब और पश्चिम बंगाल की संस्कृति और भाषा पड़ोसी देशों से मिलती-जुलती है। इसलिए केंद्र को यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्वासन की प्रक्रिया में कौन-सी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अपनाई जा रही है। अदालत ने कहा, “सीमा हमें विभाजित करती है, लेकिन संस्कृति और भाषा साझा है। केंद्र को इस पर स्पष्ट नीति सामने रखनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात को भी बनाया पक्षकार
इस मामले में दायर याचिका में दावा किया गया है कि देशभर से बंगाली भाषी मुसलमानों को पकड़कर सीधे बांग्लादेश भेजा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया और विस्तृत जवाब मांगा। साथ ही अदालत ने गुजरात को भी इस मामले में पक्षकार बना लिया है। इससे पहले नौ राज्य इस कार्यवाही का हिस्सा थे, जिनके साथ अब गुजरात भी जुड़ गया है।
“सरकार की चिंताएं निराधार नहीं” – सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संरक्षा और संसाधनों पर बोझ जैसी चिंताएं सरकार की ओर से उठाई गई हैं, जिन्हें निराधार नहीं कहा जा सकता। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि साझा संस्कृति और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखना उतना ही जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि निर्वासन की प्रक्रिया पारदर्शी और मानक नियमों के तहत ही होनी चाहिए।
केंद्र पर बढ़ा दबाव
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि वह न सिर्फ अपने ‘पुश-बैक सर्कुलर’ का कानूनी और मानवीय आधार बताए बल्कि यह भी स्पष्ट करे कि अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया कैसे संचालित हो रही है।
अवैध प्रवासियों का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह मामला अब और गंभीर हो गया है। आने वाले हफ्ते में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल किया जाने वाला जवाब इस बहस की दिशा तय करेगा कि क्या ‘पुश-बैक नीति’ राष्ट्रीय सुरक्षा और साझा सांस्कृतिक ताने-बाने के बीच संतुलन साध पाएगी या नहीं।



