नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के विरोध प्रदर्शन में उस समय एक भावुक और प्रेरक दृश्य देखने को मिला, जब सिर्फ 13 वर्ष की एक बच्ची भी हजारों छात्रों और युवाओं के बीच हाथ में तिरंगा लेकर आंदोलन का हिस्सा बनी। दरियागंज की रहने वाली उमासा ने जब मीडिया से बातचीत में कहा कि वह “बेहतर भविष्य” की उम्मीद लेकर यहां आई है, तो उसकी यह छोटी-सी बात आंदोलन की सबसे बड़ी आवाज बन गई। उसकी मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे केवल वर्तमान छात्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी सीधे जुड़े हुए हैं।
उमासा अपने पिता सलीम और अपनी मित्र रहीसा के साथ जंतर-मंतर पहुंची थी। वहां मौजूद प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच वह पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी दिखाई दी। जब उससे पूछा गया कि इतनी कम उम्र में वह विरोध प्रदर्शन में क्यों शामिल हुई है, तो उसने बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में कहा, “मैं यहां बेहतर भविष्य के लिए आई हूं।” उसने यह भी कहा कि वह नहीं चाहती कि भविष्य में उसे और उसके जैसे लाखों छात्रों को उन परिस्थितियों का सामना करना पड़े, जिनका सामना कथित पेपर लीक से प्रभावित अभ्यर्थियों ने किया।
उमासा की इस बात ने वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों और आम लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। कई लोगों ने कहा कि यह आंदोलन अब केवल छात्रों का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का व्यापक अभियान बन चुका है। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि यदि परीक्षा प्रणाली पर विश्वास कमजोर होगा तो युवाओं का भविष्य भी असुरक्षित हो जाएगा।
जंतर-मंतर पर मौजूद एक महिला प्रदर्शनकारी ने भी उमासा की बात का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि छात्रों और अभिभावकों की सबसे बड़ी मांग यह है कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाई जाए। साथ ही उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए कहा कि सरकार को प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर वास्तविक समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए। उनका कहना था कि केवल आश्वासन देने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि ठोस कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
प्रदर्शन में शामिल एक अन्य प्रतिभागी फराज ने आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए कहा कि वह किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं, बल्कि देश और उसके भविष्य के लिए यहां आए हैं। उन्होंने कहा कि कई बार विचार और आंदोलन व्यक्तियों से बड़े हो जाते हैं। उनके अनुसार भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार देती है और इसी विश्वास के साथ वे आंदोलन में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना देश के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
जंतर-मंतर पर चल रहा यह विरोध प्रदर्शन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। बड़ी संख्या में छात्र, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि यहां पहुंच रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार की हिंसा या टकराव नहीं, बल्कि सरकार तक अपनी मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचाना है। उनका मानना है कि जब लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं, तब परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित संस्थाओं की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर भी आंदोलन के प्रतिनिधियों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वांगचुक का स्वास्थ्य सर्वोपरि है और उन्हें जल्द से जल्द अपनी भूख हड़ताल समाप्त करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भूख हड़ताल समाप्त होती है, तब भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार और कथित पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा। उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य की है।
प्रदर्शन के प्रतिनिधियों ने यह भी दावा किया कि संसद मार्च के दौरान घायल हुए अधिकांश पुलिसकर्मियों को केवल मामूली चोटें आई थीं। उन्होंने कहा कि आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से चलाने की कोशिश की गई है और किसी भी प्रकार की हिंसा आंदोलन का उद्देश्य नहीं रही है। उनका कहना है कि प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच बेहतर संवाद से तनाव की स्थिति को कम किया जा सकता है।
प्रदर्शनकारियों की मांगों में अब भी दो प्रमुख मुद्दे शामिल हैं। पहला, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और दूसरा, कथित पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करने की मांग। इसके अतिरिक्त प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा है कि संसद मार्च में शामिल छात्रों और युवाओं के खिलाफ किसी प्रकार की मनमानी कानूनी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
जंतर-मंतर पर उमासा जैसी एक छोटी बच्ची की मौजूदगी ने इस आंदोलन को एक नया प्रतीक दे दिया है। उसकी मासूम आवाज में भविष्य की चिंता झलकती है और यही चिंता आज लाखों छात्रों और अभिभावकों की भी है। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि देश के विकास और युवाओं के सपनों की नींव मानी जाती है। ऐसे में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक नैतिक दायित्व भी है। यही कारण है कि जंतर-मंतर पर उठ रही आवाजें अब केवल एक परीक्षा या एक विवाद तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वे देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार, जवाबदेही और छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की व्यापक मांग के रूप में सामने आ रही हैं।
