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UGC New Rules Protest: नए नियमों का NSUI ने किया खुलकर समर्थन, अध्यक्ष वरुण चौधरी बोले- भेदभाव दूर करने में यह जरूरी कदम

The Hill India News
Last updated: January 27, 2026 1:14 pm
The Hill India News
Published: January 27, 2026
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Photo Credit: PTI
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नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों ने एक बड़े राष्ट्रव्यापी विवाद को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी को अधिसूचित ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ के खिलाफ सवर्ण समाज और कई छात्र संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। जहां दिल्ली में यूजीसी मुख्यालय का घेराव किया जा रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के रायबरेली में अनोखे प्रदर्शन की तैयारी है। मामला अब कानूनी पेचीदगियों में फंसकर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है।

Contents
विवाद की जड़: क्या है नियम 3(सी) और क्यों हो रहा विरोध?दिल्ली से रायबरेली तक प्रदर्शनों की गूँजराजनीतिक ध्रुवीकरण: कांग्रेस बनाम भाजपाअजय राय का हमला: “समाज को बांटने की कोशिश”NSUI का रुख: समर्थन लेकिन ‘सशर्त’सरकार का पक्ष: “फैलाई जा रही है भ्रांति”क्या कहता है आपदा प्रबंधन और कानूनी प्रावधान?

विवाद की जड़: क्या है नियम 3(सी) और क्यों हो रहा विरोध?

इस पूरे विवाद के केंद्र में नए रेगुलेशन का नियम 3(सी) (Rule 3-c) है। विरोध कर रहे संगठनों और याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रावधान समानता को बढ़ावा देने के नाम पर ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ यानी विपरीत भेदभाव को जन्म दे रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) में इस नियम को ‘मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक’ करार दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि उच्च शिक्षा में योग्यता (Merit) को दरकिनार कर कुछ वर्गों को अनुचित लाभ देने की कोशिश की जा रही है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को शिक्षा के समान अवसरों से बाहर किया जा सकता है।


दिल्ली से रायबरेली तक प्रदर्शनों की गूँज

सोमवार को राजधानी दिल्ली में सवर्ण समाज के सैकड़ों लोग और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि UGC Office का घेराव करने पहुंचे। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सरकार इन नियमों को तत्काल प्रभाव से वापस ले।

वहीं, उत्तर प्रदेश के रायबरेली में विरोध का एक अलग ही स्वरूप देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों और नागरिक संगठनों द्वारा जन प्रतिनिधियों को ‘चूड़ियां’ भेजने की तैयारी की जा रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है।


राजनीतिक ध्रुवीकरण: कांग्रेस बनाम भाजपा

संसद के आगामी बजट सत्र से ठीक पहले आए इस विवाद ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। विपक्ष इसे एक बड़े चुनावी और वैचारिक मुद्दे के रूप में भुनाने की तैयारी में है।

अजय राय का हमला: “समाज को बांटने की कोशिश”

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने इस मामले पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार ने पहले देश को धर्म के आधार पर बांटा और अब सवर्णों को ओबीसी और एससी-एसटी के नाम पर लड़ाने की साजिश रच रही है।” राय ने मांग की है कि वर्तमान नियमों को रद्द कर कांग्रेस शासन काल की यूजीसी गाइडलाइन्स को पुनः लागू किया जाए, क्योंकि उस समय किसी भी वर्ग को कोई आपत्ति नहीं थी।

NSUI का रुख: समर्थन लेकिन ‘सशर्त’

हैरानी की बात यह है कि जहां मुख्यधारा की कांग्रेस विरोध कर रही है, वहीं कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI ने इन नियमों का स्वागत किया है। NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए कहा कि कैंपस में होने वाले जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए यह एक आवश्यक कदम है।

हालांकि, NSUI ने एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है। उनका कहना है कि प्रस्तावित कमेटियां केवल कागजी न हों, बल्कि उनमें SC, ST और OBC छात्रों व शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व हो। साथ ही, पारदर्शिता के लिए सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।


सरकार का पक्ष: “फैलाई जा रही है भ्रांति”

विवाद बढ़ता देख केंद्र सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि UGC Regulations 2026 को लेकर विपक्ष और कुछ गुटों द्वारा भ्रांति फैलाई जा रही है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इन नियमों का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र के साथ उसकी पृष्ठभूमि के आधार पर कैंपस में भेदभाव न हो। बताया जा रहा है कि शिक्षा मंत्रालय जल्द ही इस पर एक विस्तृत ‘Clarification’ जारी कर सकता है ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके।


क्या कहता है आपदा प्रबंधन और कानूनी प्रावधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप लेता है या संस्थानों की कार्यप्रणाली को बाधित करता है, तो प्रशासन सख्त कदम उठा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है, जबकि सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि क्या नियम 3(सी) वास्तव में भेदभावपूर्ण है या यह समावेशी शिक्षा का हिस्सा है।

उच्च शिक्षा में समानता एक संवेदनशील विषय रहा है। एक तरफ हाशिए पर खड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ सामान्य वर्ग की आशंकाएं। UGC के इन नए नियमों ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। सरकार की स्पष्टीकरण वाली नीति और सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही इस विवाद को शांत कर पाएगा।

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