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नैनीताल हाईकोर्ट का सख्त रुख: एमपीजी कॉलेज मसूरी की भूमि पर बांज के पेड़ों की बलि बर्दाश्त नहीं, निर्माण कार्य पर तत्काल रोक

The Hill India News
Last updated: April 1, 2026 1:05 pm
The Hill India News
Published: April 1, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड की देवभूमि में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच चल रहे द्वंद्व में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया है। मसूरी के प्रतिष्ठित म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट (एमपीजी) कॉलेज की भूमि पर सड़क और खेल के मैदान के निर्माण के नाम पर बांज के पेड़ों की अवैध कटान को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल पेड़ कटान पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है, बल्कि राज्य सरकार, वन विभाग और मसूरी नगर पालिका को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है।

Contents
बिना अनुमति कैसे चली कुल्हाड़ी? कोर्ट ने पूछा तीखा सवालक्या है पूरा विवाद? छात्रसंघ अध्यक्ष की याचिका ने खोला मोर्चाफोटो पर छिड़ी बहस: वन विभाग ने पालिका के दावों की हवा निकालीहिमालयी पर्यावरण और बांज का महत्वकोर्ट का आगामी कदम: 4 हफ्ते में देना होगा जवाब

बिना अनुमति कैसे चली कुल्हाड़ी? कोर्ट ने पूछा तीखा सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट का तेवर बेहद सख्त नजर आया। माननीय न्यायालय ने नगर पालिका प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि आखिर किसकी अनुमति से इन बहुमूल्य पेड़ों को काटा जा रहा था? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में बांज (Oak) के पेड़ों का महत्व सर्वोपरि है और बिना वैधानिक प्रक्रिया के उन्हें काटना अपराध की श्रेणी में आता है। नैनीताल हाईकोर्ट मसूरी पेड़ कटान मामले में याचिकाकर्ता की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक क्षेत्र में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप या पेड़ों को नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।

क्या है पूरा विवाद? छात्रसंघ अध्यक्ष की याचिका ने खोला मोर्चा

इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एमपीजी कॉलेज मसूरी के छात्रसंघ अध्यक्ष और पर्यावरण प्रेमी प्रवेश राणा द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से हुई। याचिका में आरोप लगाया गया कि मसूरी नगर पालिका ने कॉलेज के हॉस्टल की लगभग 2 एकड़ भूमि पर खेल का मैदान और सड़क बनाने के लिए निविदा (Tender) जारी की थी। विकास की इस योजना की आड़ में पालिका प्रशासन ने वन विभाग से अनुमति लिए बिना ही वहां दशकों से मौजूद बांज के पेड़ों को काटना शुरू कर दिया।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि:

  • मसूरी के निजी और सरकारी एस्टेट्स में बांज के वृक्षों का संरक्षण दशकों से स्थानीय शैक्षणिक संस्थानों द्वारा किया जा रहा है।

  • 1948 का एक्ट: बांज के पेड़ों की सुरक्षा के लिए विशेष अधिनियम लागू है, जिसके तहत पेड़ काटने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी की अनुमति अनिवार्य है।

  • 16 मार्च 2026 को इस संबंध में नगर पालिका को प्रत्यावेदन दिया गया था, जिसे प्रशासन ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

फोटो पर छिड़ी बहस: वन विभाग ने पालिका के दावों की हवा निकाली

कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान उस वक्त नाटकीय मोड़ आया जब याचिकाकर्ता की ओर से पेश की गई तस्वीरों की सत्यता पर बहस छिड़ी। नगर पालिका के अधिवक्ताओं ने इन तस्वीरों को फर्जी बताते हुए दावा किया कि ये तस्वीरें संबंधित स्थल की नहीं हैं। हालांकि, सरकारी तंत्र के भीतर ही विरोधाभास तब दिखा जब वन विभाग ने कोर्ट में स्वीकार किया कि ये तस्वीरें उसी स्थल की हैं जहाँ पेड़ काटे गए हैं।

राज्य सरकार की ओर से भी यह स्वीकार किया गया कि इस निर्माण कार्य या वृक्ष कटान के लिए नगर पालिका ने पूर्व में कोई आधिकारिक अनुमति प्राप्त नहीं की थी। सरकारी विभागों के बीच इस तालमेल की कमी और नगर पालिका की मनमानी पर कोर्ट ने गहरा असंतोष व्यक्त किया।

हिमालयी पर्यावरण और बांज का महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार, बांज का पेड़ उत्तराखंड के जल स्रोतों को जीवित रखने और भूस्खलन रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। “बांज” को उत्तराखंड का ‘वरदान’ माना जाता है। नैनीताल हाईकोर्ट मसूरी पेड़ कटान प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या खेल के मैदान और सड़कों जैसे कंक्रीट के ढांचे, इन प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर बनाए जाने चाहिए?

कोर्ट का आगामी कदम: 4 हफ्ते में देना होगा जवाब

अदालत ने अब गेंद प्रशासन के पाले में डाल दी है। नगर पालिका मसूरी, उत्तराखंड शासन और वन विभाग को अब यह साबित करना होगा कि उन्होंने किन नियमों के तहत इस संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण की योजना बनाई। यदि चार सप्ताह के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो नगर पालिका के अधिकारियों पर वैधानिक गाज गिरना तय माना जा रहा है।

हाईकोर्ट के इस आदेश ने पर्यावरण प्रेमियों में एक नई उम्मीद जगाई है। मसूरी जैसे संवेदनशील हिल स्टेशन पर जहां अनियंत्रित निर्माण पहले ही खतरे की घंटी बजा रहा है, वहां न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप हरियाली बचाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। फिलहाल, एमपीजी कॉलेज की भूमि पर सन्नाटा है और कुल्हाड़ियों की गूँज कोर्ट के आदेश के बाद थम गई है।

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