देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखंड के कृषि क्षेत्र के लिए बुधवार का दिन एक अत्यंत दुखद समाचार लेकर आया। राज्य के पूर्व कृषि निदेशक गौरी शंकर का हृदय गति रुकने (हार्ट अटैक) के कारण आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही कृषि विभाग, प्रशासनिक अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, सामाजिक संगठनों और हजारों किसानों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। उत्तराखंड के कृषि विकास में उनके योगदान को सदैव याद किया जाएगा। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार को हल्द्वानी में पूरे राजकीय सम्मान और श्रद्धा के साथ किया जाएगा।
बताया जा रहा है कि गौरी शंकर हाल ही में दिल्ली से नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाकर लौटे थे। किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि कृषि क्षेत्र का यह अनुभवी और दूरदर्शी व्यक्तित्व इतनी जल्दी सभी को छोड़कर चला जाएगा। उनके निधन की सूचना मिलते ही प्रदेश भर से शोक संदेशों का सिलसिला शुरू हो गया।
लगभग एक दशक तक संभाली कृषि विभाग की कमान
गौरी शंकर का नाम उत्तराखंड कृषि विभाग के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उन्होंने 1 जुलाई 2015 से 22 दिसंबर 2023 तक लगभग साढ़े आठ वर्षों तक उत्तराखंड के कृषि निदेशक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यह कार्यकाल राज्य गठन के बाद कृषि विभाग में सबसे लंबे और प्रभावशाली नेतृत्व कालों में गिना जाता है।
अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने न केवल विभागीय योजनाओं को नई दिशा दी बल्कि कृषि को रोजगार और स्वरोजगार का मजबूत माध्यम बनाने के लिए भी कई अभिनव प्रयास किए। उनके नेतृत्व में कृषि विभाग ने अनेक नई ऊंचाइयों को छुआ और किसानों तक सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावी ढंग से पहुंचाया गया।
जैविक खेती को दिलाई राष्ट्रीय पहचान
उत्तराखंड की पर्वतीय परिस्थितियों को समझते हुए गौरी शंकर ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (USOCA) के माध्यम से हजारों किसानों को जैविक खेती से जोड़ने का अभियान चलाया। उनके प्रयासों से उत्तराखंड के कई उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान मिली।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में जैविक कृषि को जो मजबूती आज दिखाई देती है, उसमें गौरी शंकर की दूरदर्शी सोच और प्रभावी रणनीतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
किसानों तक योजनाओं को पहुंचाने में निभाई अहम भूमिका
गौरी शंकर हमेशा मानते थे कि योजनाओं की सफलता तभी है जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसी सोच के साथ उन्होंने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan), मिलेट मिशन, कृषि यंत्रीकरण योजना, बीज वितरण कार्यक्रम तथा अन्य केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं को दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए विशेष अभियान चलाए।
उनके निर्देशन में विभागीय अधिकारियों ने गांव-गांव जाकर किसानों को योजनाओं की जानकारी दी और उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने का प्रयास किया। यही कारण है कि प्रदेश के अनेक किसान उन्हें अपना मार्गदर्शक और हितैषी मानते थे।
सौम्य व्यक्तित्व और उत्कृष्ट प्रशासक के रूप में मिली पहचान
गौरी शंकर केवल एक कुशल प्रशासक ही नहीं थे, बल्कि अपने सरल, सहज और मिलनसार स्वभाव के कारण भी बेहद लोकप्रिय थे। विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उन्हें एक ऐसे नेतृत्वकर्ता के रूप में याद करते हैं जो हमेशा टीम भावना में विश्वास रखते थे और हर स्तर के कर्मचारी की बात को गंभीरता से सुनते थे।
उनके साथ कार्य कर चुके अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने कृषि और उद्यान विभाग के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने, विभागीय समन्वय बढ़ाने तथा तकनीकी दक्षता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कृषि जगत में हमेशा याद किए जाएंगे गौरी शंकर
गौरी शंकर का निधन उत्तराखंड कृषि विभाग और किसान समुदाय के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने पूरे सेवाकाल में किसानों के कल्याण, कृषि विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए समर्पित भाव से कार्य किया। उनकी दूरदर्शिता, कार्यनिष्ठा और किसानों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
आज जब पूरा उत्तराखंड उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, तब हर किसी की जुबान पर एक ही बात है—गौरी शंकर भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन कृषि विकास के लिए उनके द्वारा किए गए कार्य और किसानों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा जीवित रहेगी। उनकी स्मृतियां और योगदान उत्तराखंड के कृषि इतिहास का अमूल्य अध्याय बनकर सदैव याद किए जाएंगे।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे तथा शोक संतप्त परिवार को इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति दे।
