नई दिल्ली: भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकार की सख्ती अब असर दिखाती नजर आ रही है। Meta ने भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग को लेकर भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग करने पर सहमति जताई है। सरकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक यह कदम ऑनलाइन बाल सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत सरकार सोशल मीडिया कंपनियों से उनके प्लेटफॉर्म पर मौजूद हानिकारक और गैरकानूनी कंटेंट के खिलाफ अधिक प्रभावी कार्रवाई की मांग कर रही है। खासकर Child Sexual Abuse Material यानी CSAM/CSEAM से जुड़े मामलों को लेकर सरकार और बाल अधिकार संस्थाओं की चिंता लगातार बढ़ी है।
हालांकि, इस पूरे मामले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में CSAM रिपोर्टिंग का मौजूदा सिस्टम पहले से NCMEC के साथ जुड़ा हुआ है। भारत सरकार और अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) के बीच 2019 से एक व्यवस्था मौजूद है, जिसके तहत NCMEC से प्राप्त CyberTipline रिपोर्ट भारतीय तंत्र तक पहुंचती हैं और उन्हें आगे कार्रवाई के लिए संबंधित राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तक भेजा जाता है।
अब Meta की भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग की सहमति को इसी व्यवस्था को और मजबूत करने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
Meta का फैसला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
भारत में करोड़ों लोग Meta के प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं। इनमें Facebook, Instagram और WhatsApp जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म शामिल हैं। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों से संबंधित संवेदनशील और गैरकानूनी गतिविधियों की पहचान, रिपोर्टिंग और कार्रवाई का तंत्र बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार Meta अब भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों को संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ साझा करने के लिए सीधे सहयोग करेगा। इससे भारतीय अधिकारियों को गंभीर मामलों में प्लेटफॉर्म के साथ समन्वय करने और आवश्यक कार्रवाई के लिए जानकारी हासिल करने में मदद मिल सकती है।
सरकार की प्राथमिकता यह है कि अगर किसी बच्चे से जुड़ी गंभीर ऑनलाइन सुरक्षा समस्या सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई में अनावश्यक देरी न हो।
सरकार लगातार Meta पर बना रही थी दबाव
यह फैसला अचानक सामने नहीं आया है। पिछले कुछ महीनों से भारत सरकार और Meta के बीच कंटेंट मॉडरेशन, बच्चों की सुरक्षा, डीपफेक, एल्गोरिदम और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे मुद्दों पर बातचीत चल रही थी।
सरकार का जोर इस बात पर रहा है कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को केवल अपनी वैश्विक नीतियों के आधार पर नहीं, बल्कि भारतीय कानून और नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप भी अपने सिस्टम तैयार करने चाहिए। अगस्त में भी सरकार और Meta के बीच कंटेंट मॉडरेशन तथा ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत जारी रहने की खबरें सामने आई थीं।
अब बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में भारतीय एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग की सहमति को सरकार की इसी व्यापक नीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
NCPCR की जांच के बीच आया बड़ा घटनाक्रम
Meta के खिलाफ भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी जांच पहले से चल रही है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने Instagram पर कथित तौर पर CSAM/CSEAM से जुड़े विज्ञापनों के मामले में Meta India के अधिकारियों को तलब किया था।
सितंबर की शुरुआत में NCPCR ने Meta India के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडिया हेड को आयोग के सामने पेश होने के लिए बुलाया था। यह कार्रवाई उस मीडिया जांच के बाद हुई, जिसमें Instagram पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कथित विज्ञापनों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे।
9 सितंबर 2026 को Meta के वरिष्ठ अधिकारियों के NCPCR के सामने पेश होने की भी रिपोर्ट सामने आई। इससे साफ है कि भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर नियामकीय जांच काफी गंभीर स्तर तक पहुंच चुकी है।
NHRC ने भी उठाए थे गंभीर सवाल
मामला केवल NCPCR तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी Instagram पर CSAM से जुड़े कथित विज्ञापनों को लेकर संज्ञान लिया और संबंधित सरकारी विभागों तथा दिल्ली पुलिस से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी।
NHRC ने Meta की तकनीक और AI आधारित सिस्टम्स की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं। आयोग ने यह जांचने को कहा कि Meta के सिस्टम केवल एक “मध्यस्थ” की भूमिका निभा रहे हैं या वे कंटेंट को जनरेट, मॉडिफाई, क्यूरेट, रिकमेंड, पब्लिश, एम्प्लीफाई या मोनेटाइज करने में ऐसी भूमिका निभा रहे हैं, जिससे उसकी जवाबदेही का सवाल और गंभीर हो सकता है।
यानी सरकार और विभिन्न संवैधानिक संस्थाएं अब केवल यह नहीं देख रही हैं कि प्लेटफॉर्म शिकायत मिलने के बाद कंटेंट हटाता है या नहीं, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि उसके तकनीकी सिस्टम हानिकारक कंटेंट को यूजर्स तक पहुंचने से पहले कितना प्रभावी ढंग से रोकते हैं।
भारत में पहले से मौजूद है Cyber Crime Reporting System
बच्चों के खिलाफ ऑनलाइन अपराधों से निपटने के लिए भारत में पहले से National Cyber Crime Reporting Portal मौजूद है। इस पोर्टल पर नागरिक ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री समेत साइबर अपराधों की शिकायत कर सकते हैं। सरकार ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों पर विशेष ध्यान देने के लिए भी व्यवस्था बनाई है।
इसके अलावा Indian Cyber Crime Coordination Centre यानी I4C साइबर अपराधों से निपटने में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की भूमिका निभाता है। सरकार ने साइबर फोरेंसिक, पुलिस प्रशिक्षण और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठाए हैं।
इसलिए Meta की ओर से भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग की दिशा में बढ़ना मौजूदा व्यवस्था के लिए एक अतिरिक्त महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है।
सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं, कंटेंट की पहचान भी जरूरी
सरकार की चिंता केवल रिपोर्ट मिलने तक सीमित नहीं है। अधिकारियों का जोर इस बात पर भी है कि सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे सिस्टम विकसित करने चाहिए, जो हानिकारक और गैरकानूनी कंटेंट की पहचान यूजर की शिकायत का इंतजार किए बिना कर सकें।
बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर किसी आपत्तिजनक सामग्री का प्रसार तेजी से हो रहा है, तो केवल शिकायत आने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्लेटफॉर्म्स को अपनी तकनीकी क्षमताओं, मॉडरेशन सिस्टम और सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करना होगा।
यही वजह है कि सरकार Meta समेत अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से सक्रिय और प्रभावी सुरक्षा तंत्र की अपेक्षा कर रही है।
Meta पहले भी बता चुका है अपनी रिपोर्टिंग व्यवस्था
Meta ने जुलाई 2026 में बच्चों के शोषण से निपटने के अपने प्रयासों पर जानकारी देते हुए कहा था कि जब उसे बच्चों के संभावित शोषण की जानकारी मिलती है, तो वह लागू कानूनों के अनुरूप स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों तक रिपोर्ट पहुंचाने की प्रक्रिया अपनाता है। भारत के संदर्भ में Meta ने कहा था कि POCSO कानून और संबंधित नियमों के तहत रिपोर्टिंग प्रक्रिया में NCMEC की भूमिका रही है और NCMEC की रिपोर्ट राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल तक पहुंचती है।
इसलिए अब सामने आया नया घटनाक्रम इस व्यवस्था में भारतीय एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग को और मजबूत करने के रूप में समझा जाना चाहिए।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सरकार का सख्त संदेश
केंद्र सरकार का संदेश साफ है कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। जुलाई 2026 में सरकार ने भी CSAM से जुड़े मामलों पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से तेजी से कार्रवाई और मजबूत due diligence की जरूरत पर जोर दिया था।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और बढ़ सकती है। सरकार प्लेटफॉर्म्स से यह उम्मीद कर रही है कि वे न केवल गैरकानूनी कंटेंट हटाएं, बल्कि उसकी पहचान, प्रसार रोकने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग की प्रक्रिया को भी मजबूत करें।
आगे क्या बदलेगा?
Meta और भारतीय एजेंसियों के बीच बढ़ता सीधा सहयोग जांच प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है। गंभीर मामलों में अधिकारियों को प्लेटफॉर्म से संबंधित जानकारी हासिल करने, संदिग्ध गतिविधियों की जांच करने और पीड़ित बच्चों की सुरक्षा के लिए तेजी से कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस पूरे बदलाव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि रिपोर्टिंग कितनी तेजी से होती है, जानकारी कितनी उपयोगी होती है, प्लेटफॉर्म संदिग्ध कंटेंट की पहचान कितनी प्रभावी तरीके से करते हैं और कानून प्रवर्तन एजेंसियां उस जानकारी पर कितनी जल्दी कार्रवाई करती हैं।
कुल मिलाकर, Meta का भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सीधे सहयोग के लिए आगे आना भारत में ऑनलाइन बाल सुरक्षा और सोशल मीडिया जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। सरकार इसे एक शुरुआत के रूप में देख रही है, लेकिन असली चुनौती अब इस व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करने की है। बच्चों को ऑनलाइन शोषण और खतरनाक कंटेंट से बचाने के लिए केवल एक प्लेटफॉर्म का फैसला पर्याप्त नहीं होगा; इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों, सरकार, पुलिस, बाल अधिकार संस्थाओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच लगातार और मजबूत समन्वय जरूरी होगा।
