नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बड़ा दावा किया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ चल रहा सैन्य संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा और जैसे ही यह टकराव खत्म होगा, तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिलेगी। उनके इस बयान ने ऐसे समय में बाजार का ध्यान खींचा है, जब युद्ध और सप्लाई रूट पर बढ़ते दबाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं।
ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ संघर्ष खत्म होने के बाद तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं। उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बढ़ी कीमतों के लिए पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनके प्रशासन को भी जिम्मेदार ठहराया। ट्रंप का तर्क है कि मौजूदा महंगाई और कीमतों में बढ़ोतरी के लिए उनकी नीतियां जिम्मेदार नहीं हैं।
हालांकि, ट्रंप के इस दावे के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की तस्वीर फिलहाल कुछ अलग दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव, होर्मूज जलडमरूमध्य में बाधित आवाजाही और सऊदी अरब की महत्वपूर्ण तेल पाइपलाइन बंद होने से वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है। मंगलवार की रिपोर्ट के अनुसार Brent करीब 106.93 डॉलर प्रति बैरल और WTI करीब 102.65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया था।
ट्रंप बोले- युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को लेकर दावा किया है कि यह टकराव जल्द खत्म हो सकता है। उनका कहना है कि जैसे ही युद्ध समाप्त होगा, तेल की कीमतों पर बना दबाव भी तेजी से कम हो जाएगा।
ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि ईरान समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। बाजार के लिए यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव कम होता है तथा क्षेत्र में तेल और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर बना geopolitical premium तेजी से कम हो सकता है।
लेकिन फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। यही वजह है कि ट्रंप के बयान के बावजूद तेल की कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट नहीं आई है।
सऊदी अरब की पाइपलाइन बंद होने से बढ़ी चिंता
तेल की कीमतों में हालिया उछाल की एक बड़ी वजह सऊदी अरब की महत्वपूर्ण East-West Pipeline का बंद होना है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को लाल सागर के तट तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इसका एक बड़ा फायदा यह है कि इससे तेल को होर्मूज जलडमरूमध्य से बचाकर दूसरे रास्ते से भेजा जा सकता है।
हालिया हमलों के बाद इस पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। इससे बाजार में यह चिंता बढ़ गई कि यदि पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहती है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार यह मार्ग सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन करीब 4 मिलियन बैरल तक तेल की आवाजाही से जुड़ा है, जो वैश्विक सप्लाई का लगभग 4 प्रतिशत हो सकता है।
यही कारण है कि निवेशक और तेल कारोबारी अब केवल युद्ध की स्थिति ही नहीं, बल्कि तेल के वैकल्पिक परिवहन मार्गों पर भी नजर बनाए हुए हैं।
होर्मूज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा जोखिम
दुनिया के तेल बाजार के लिए होर्मूज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष तथा क्षेत्र में सहयोगी समूहों की गतिविधियों के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इसके अलावा लाल सागर क्षेत्र में भी तनाव बढ़ा है। ऐसे में बाजार को डर है कि अगर संघर्ष और फैलता है तो तेल की सप्लाई और परिवहन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
यही डर कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। हालिया घटनाक्रम में Brent क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है।
तेल महंगा होने से दुनिया पर क्या असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। तेल महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे सामान की ढुलाई महंगी हो सकती है। इसका असर खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों, एयरलाइन सेवाओं और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहती हैं तो दुनिया के कई देशों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार इस समय अमेरिका-ईरान संघर्ष और मध्य पूर्व से आने वाली हर खबर पर नजर रख रहा है।
क्या सच में बहुत नीचे आ सकता है तेल?
ट्रंप का दावा है कि संघर्ष खत्म होने के बाद तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। इसका आर्थिक आधार भी है। यदि युद्ध समाप्त होता है, होर्मूज और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर आवाजाही सामान्य होती है और तेल की सप्लाई बाधित होने का डर खत्म होता है, तो बाजार में मौजूद युद्ध से जुड़ा जोखिम प्रीमियम कम हो सकता है।
ऐसी स्थिति में कारोबारी भविष्य में सप्लाई को लेकर कम चिंतित होंगे और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन यह गिरावट कितनी बड़ी होगी और कितनी तेजी से आएगी, यह कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ईरान-अमेरिका संघर्ष वास्तव में कब खत्म होता है, तेल परिवहन मार्ग कब सामान्य होते हैं और सऊदी अरब की पाइपलाइन कब दोबारा चालू होती है।
बाइडेन पर भी ट्रंप का हमला
तेल कीमतों को लेकर बयान देते हुए ट्रंप ने एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका में कीमतों में बढ़ोतरी के लिए बाइडेन प्रशासन की नीतियां जिम्मेदार थीं।
ट्रंप ने अपने प्रशासन के फैसलों का बचाव करते हुए यह भी कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना उनके लिए महत्वपूर्ण था। उन्होंने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से जुड़े अपने फैसलों का भी बचाव किया है।
हालांकि, युद्ध के कारण तेल और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी अब अमेरिकी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। इससे आने वाले समय में ट्रंप प्रशासन पर घरेलू महंगाई और ईंधन की कीमतों को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल बाजार की नजर इन तीन चीजों पर
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की दिशा काफी हद तक तीन प्रमुख बातों पर निर्भर करेगी।
पहला, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष कब और किस तरह समाप्त होता है।
दूसरा, होर्मूज जलडमरूमध्य और लाल सागर में तेल टैंकरों की आवाजाही कितनी जल्दी सामान्य होती है।
तीसरा, सऊदी अरब की East-West Pipeline कितने समय में फिर से संचालन में आती है।
अगर इन तीनों मोर्चों पर तेजी से सुधार होता है तो ट्रंप का तेल कीमतों में बड़ी गिरावट वाला दावा सही दिशा में जाता दिखाई दे सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचता है या तेल सप्लाई के दूसरे रास्तों पर भी हमला और बाधा बढ़ती है, तो कीमतों में और उछाल का खतरा बना रहेगा।
कुल मिलाकर, ट्रंप ने जहां ईरान युद्ध खत्म होने के बाद तेल की कीमतों में तेज गिरावट का दावा किया है, वहीं मौजूदा बाजार में तस्वीर अभी उलट है। युद्ध और सप्लाई रूट पर बढ़ते खतरे के कारण Brent 100 डॉलर से काफी ऊपर बना हुआ है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष कब समाप्त होता है और उसके बाद क्या सच में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे आती हैं।
