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Reading: दुर्गा पूजा में मछली-मांस पर बवाल! धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर बंगाल बीजेपी ने कहा—‘बंगाली वही खाएंगे, जो पीढ़ियों से खाते आए हैं’
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The Hill India > Blog > देश > दुर्गा पूजा में मछली-मांस पर बवाल! धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर बंगाल बीजेपी ने कहा—‘बंगाली वही खाएंगे, जो पीढ़ियों से खाते आए हैं’
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दुर्गा पूजा में मछली-मांस पर बवाल! धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर बंगाल बीजेपी ने कहा—‘बंगाली वही खाएंगे, जो पीढ़ियों से खाते आए हैं’

The Hill India News
Last updated: September 8, 2026 7:07 am
The Hill India News
Published: September 8, 2026
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पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले खान-पान को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रसिद्ध कथावाचक और बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की उस अपील के बाद राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है, जिसमें उन्होंने दुर्गा पूजा के दौरान लोगों से मछली और मांस जैसे मांसाहारी भोजन से दूर रहने की अपील की थी। शास्त्री की इस टिप्पणी पर पश्चिम बंगाल बीजेपी ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि बंगाल के लोगों के खान-पान और पहनावे का फैसला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता।

Contents
धीरेंद्र शास्त्री ने क्या अपील की थी?बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने शास्त्री की बात से बनाई दूरी‘बंगाली वही खाएंगे, जो खाते आए हैं’काली पूजा और बलि की परंपरा का भी दिया उदाहरणधर्म, खान-पान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहसशास्त्री के दौरे ने भी खींचा राजनीतिक ध्यान

पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने धीरेंद्र शास्त्री की अपील से दूरी बनाते हुए साफ कहा कि बंगाल की अपनी संस्कृति, परंपरा और खान-पान की अलग पहचान है। उन्होंने कहा कि बंगाली समाज लंबे समय से जिस तरह का भोजन करता आया है, उसे किसी के कहने मात्र से बदला नहीं जा सकता। उनके बयान के बाद यह मामला केवल धार्मिक अपील तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और व्यक्तिगत पसंद के सवाल से भी जुड़ गया है।

धीरेंद्र शास्त्री ने क्या अपील की थी?

दरअसल, पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक पर्व के समय मांसाहारी भोजन से परहेज करने की अपील की थी। उन्होंने त्योहार के दौरान मछली और मांस खाने को लेकर सवाल उठाए और लोगों से धार्मिक अवसरों पर इस प्रकार के भोजन से बचने का आग्रह किया। उन्होंने ऐसे लोगों की आलोचना भी की, जो एक तरफ धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं और दूसरी तरफ मांसाहारी भोजन करते हैं।

शास्त्री की इस टिप्पणी के बाद बंगाल में बहस शुरू हो गई। उनके समर्थकों ने इसे धार्मिक आस्था और शुद्धता से जोड़कर देखा, जबकि विरोध करने वालों ने इसे बंगाल की पारंपरिक संस्कृति और लोगों की व्यक्तिगत पसंद में दखल के तौर पर लिया।

बंगाल में मछली केवल भोजन नहीं, बल्कि वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। ऐसे में दुर्गा पूजा जैसे सबसे बड़े त्योहारों में खान-पान को लेकर किसी तरह की पाबंदी या अपील स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गई।

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने शास्त्री की बात से बनाई दूरी

धीरेंद्र शास्त्री की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि वह एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में शास्त्री का सम्मान करते हैं, लेकिन उनके व्यक्तिगत विचारों को बंगाल के पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि किसी संत या चिकित्सक को लोगों को शाकाहारी जीवन अपनाने की सलाह देने का अधिकार हो सकता है, लेकिन कोई बाहरी व्यक्ति बंगाल में बैठकर यह तय नहीं कर सकता कि यहां के लोग क्या खाएंगे और क्या पहनेंगे।

बीजेपी नेता का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में पार्टी लंबे समय से राज्य की स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय भावनाओं को ध्यान में रखकर अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार करती रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि किसी धार्मिक व्यक्ति की टिप्पणी को बीजेपी की आधिकारिक सोच के रूप में देखा जाए।

समिक भट्टाचार्य ने यह भी स्पष्ट किया कि धीरेंद्र शास्त्री की मांसाहारी भोजन को लेकर की गई टिप्पणी उनके निजी विचार हैं। पार्टी का मानना है कि बंगाल के लोगों की खान-पान की आदतों और सांस्कृतिक परंपराओं को किसी बाहरी विचार के आधार पर बदलने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।

‘बंगाली वही खाएंगे, जो खाते आए हैं’

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने बंगाल की पारंपरिक जीवनशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाली समाज अपनी परंपराओं के अनुसार जीवन जीता आया है और उसे अपने तरीके से जीने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर बंगाली मछली और मांस क्यों नहीं खा सकते?

उनके बयान में बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को लेकर स्पष्ट संदेश दिखाई दिया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाल की परंपराओं और विचारों को समझने के लिए अपने ही महान संतों और विचारकों को देखा जाना चाहिए।

समिक भट्टाचार्य का कहना था कि बंगाल में धार्मिक आस्था और खान-पान की परंपराएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं। यहां कई ऐसी धार्मिक परंपराएं हैं, जिनमें शाकाहारी भोजन के साथ-साथ मांसाहारी भोजन का भी ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है।

काली पूजा और बलि की परंपरा का भी दिया उदाहरण

बीजेपी नेता ने बंगाल की धार्मिक परंपराओं का उदाहरण देते हुए देवी काली की पूजा और बलि की प्रथा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राज्य के कई हिस्सों में धार्मिक परंपराओं के तहत बकरे की बलि देने की प्रथा लंबे समय से चली आ रही है।

उन्होंने दुर्गा पूजा के दौरान पारंपरिक भोजन का भी उल्लेख किया और कहा कि अष्टमी पर लुची और नवमी पर मांस खाने जैसी परंपराएं बंगाल के कई परिवारों में लंबे समय से चली आ रही हैं। ऐसे में लोगों से अचानक इन परंपराओं को छोड़ने के लिए कहना उचित नहीं होगा।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि बंगाल में हर परिवार और समुदाय की धार्मिक तथा खान-पान की परंपरा एक जैसी नहीं है। कुछ लोग पूरी तरह शाकाहारी भोजन करते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग मछली और मांस को अपने पारंपरिक भोजन का हिस्सा मानते हैं। इसलिए इस मुद्दे पर एक ही नियम पूरे समाज पर लागू करना आसान नहीं है।

धर्म, खान-पान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहस

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर चर्चा छेड़ दी है। एक पक्ष का तर्क है कि धार्मिक त्योहारों के दौरान व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार खान-पान करना चाहिए। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है और किसी व्यक्ति को अपनी पसंद का भोजन करने से रोका नहीं जाना चाहिए।

बंगाल में यह बहस इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां धार्मिक परंपराओं के साथ क्षेत्रीय संस्कृति का गहरा संबंध है। दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बंगाली समाज के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। पूजा के दौरान परिवारों का मिलना-जुलना, पारंपरिक भोजन, नए कपड़े और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम इस पर्व का हिस्सा होते हैं।

शास्त्री के दौरे ने भी खींचा राजनीतिक ध्यान

धीरेंद्र शास्त्री के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान भी राजनीतिक चर्चा देखने को मिली थी। उनके कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों को लेकर राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। बीजेपी नेताओं और समर्थकों ने उनके कार्यक्रमों को धार्मिक गतिविधियों के रूप में देखा, जबकि विरोधी दलों ने इसे राजनीतिक संदर्भों से भी जोड़कर देखा।

अब दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर शास्त्री की टिप्पणी ने इस बहस को एक नया मुद्दा दे दिया है। बीजेपी प्रदेश नेतृत्व की प्रतिक्रिया से यह संकेत भी मिला है कि पार्टी बंगाल की स्थानीय संस्कृति और खान-पान को लेकर किसी तरह के विवाद में सीधे तौर पर शामिल नहीं होना चाहती।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या धार्मिक त्योहारों के दौरान खान-पान को लेकर किसी तरह की अपील लोगों की धार्मिक भावनाओं को मजबूत करेगी या फिर यह क्षेत्रीय संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद के बीच नया विवाद खड़ा करेगी। बंगाल बीजेपी ने अपनी तरफ से यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य के लोगों के खान-पान का फैसला कोई बाहर से आकर नहीं कर सकता।

दुर्गा पूजा के दौरान मछली-मांस खाने का मुद्दा अब केवल भोजन की पसंद का विषय नहीं रह गया है। यह बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक परंपराओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक सोच से जुड़ी बहस बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर धार्मिक संगठनों, राजनीतिक दलों और बंगाल के आम लोगों की प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है।

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