हरिद्वार: उत्तराखंड पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए एक ऐसे कथित नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसके तार बिहार के नालंदा तक जुड़े बताए जा रहे हैं। हरिद्वार की श्यामपुर कोतवाली पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि आरोपियों के कब्जे से बड़ी संख्या में एटीएम कार्ड, बैंक पासबुक, सिम कार्ड, मोबाइल फोन, लैपटॉप और नकदी बरामद की गई है। प्रारंभिक जांच में करीब 2 करोड़ 75 लाख रुपये से अधिक के संदिग्ध डिजिटल लेनदेन के सुराग मिले हैं, जिनकी विस्तृत जांच की जा रही है।
मामले का खुलासा हरिद्वार में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान किया गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में तीन बिहार के रहने वाले बताए गए हैं, जबकि दो आरोपी हरिद्वार क्षेत्र के निवासी हैं। जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हैं और आशंका जताई जा रही है कि इस गिरोह से कई अन्य लोग भी जुड़े हो सकते हैं।
पुलिस के अनुसार, 25 अगस्त की रात श्यामपुर कोतवाली पुलिस क्षेत्र में संदिग्ध वाहनों की नियमित चेकिंग कर रही थी। इसी दौरान पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि सज्जनपुर पीली क्षेत्र में एक सफेद रंग की स्विफ्ट कार में सवार कुछ लोग साइबर ठगी की गतिविधियों से जुड़े हो सकते हैं। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस टीम ने रसियाबड़ सिंगल लाइन प्वाइंट के पास चेकिंग अभियान तेज कर दिया।
कुछ समय बाद चिड़ियापुर की ओर से आती एक संदिग्ध कार को पुलिस ने रोक लिया। कार में पांच लोग सवार थे। पुलिस ने जब वाहन और उसमें रखे सामान की तलाशी ली तो एक बैग से बड़ी संख्या में बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन से जुड़े उपकरण व दस्तावेज बरामद हुए। बरामदगी देखकर पुलिस को इस पूरे मामले में एक संगठित साइबर नेटवर्क की आशंका हुई।
पुलिस के मुताबिक आरोपियों के कब्जे से 35 एटीएम कार्ड, 14 बैंक पासबुक, 17 सिम कार्ड, 18 मोबाइल फोन, दो लैपटॉप और 37,500 रुपये की नकदी बरामद की गई है। बरामद पासबुक और एटीएम कार्ड अलग-अलग बैंकों से संबंधित बताए जा रहे हैं। इनमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, इंडियन बैंक और नैनीताल बैंक समेत कई बैंकों के खाते शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह भी पता चला है कि इन बैंक खातों का संबंध हरिद्वार, कनखल, ऋषिकेश, देहरादून और आसपास के क्षेत्रों से हो सकता है। जांच टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि ये खाते किन लोगों के नाम पर खोले गए थे, खाताधारकों की भूमिका क्या थी और क्या वे स्वयं इस नेटवर्क में शामिल थे या फिर उन्हें किसी प्रकार के लालच या धोखे के जरिए अपने बैंक खाते उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल किया गया।
मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों की शुरुआती जांच में भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। पुलिस के अनुसार, मोबाइल फोन में मौजूद व्हाट्सऐप चैट के जरिए बैंक खाता नंबर, खाताधारकों के नाम, क्यूआर कोड और लेनदेन से जुड़ी अन्य जानकारियां साझा किए जाने के संकेत मिले हैं। इसके अलावा मोबाइल गैलरी में बैंक पासबुक और बैंक खातों से संबंधित दस्तावेजों की कई तस्वीरें भी मिली हैं।
खाते जुटाकर ठगी की रकम निकालने का आरोप
पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि आरोपी कथित तौर पर लोगों से बैंक खाते, पासबुक, एटीएम कार्ड और सिम कार्ड हासिल करते थे। इसके बाद उन खातों के एटीएम पिन और यूपीआई से जुड़ी जानकारी अपने पास रखी जाती थी। साइबर ठगी से प्राप्त रकम को पहले इन बैंक खातों में भेजे जाने का संदेह है।
इसके बाद रकम को यूपीआई और अन्य डिजिटल माध्यमों से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता था। कई स्तरों पर पैसे को इधर-उधर भेजने के बाद एटीएम या अन्य माध्यमों से नकदी निकाली जाती थी। पुलिस का मानना है कि इस तरीके का इस्तेमाल धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना मुश्किल बनाने के लिए किया जा सकता था।
पूछताछ में यह भी सामने आया है कि रकम निकालने के बाद इसमें शामिल लोगों के बीच कमीशन के आधार पर हिस्सेदारी बांटी जाती थी। हालांकि पुलिस अभी बैंक खातों की विस्तृत स्टेटमेंट, केवाईसी दस्तावेज और ट्रांजेक्शन हिस्ट्री की जांच कर रही है। इसलिए पूरे नेटवर्क में कितनी राशि का वास्तविक साइबर फ्रॉड हुआ और किन-किन लोगों तक यह पैसा पहुंचा, इसका अंतिम आंकड़ा जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
म्यूल अकाउंट के जरिए चल रहा था कथित नेटवर्क
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच में सीआईयू, एसओजी और साइबर सेल को भी शामिल किया गया है। पुलिस के अनुसार पूछताछ में यह जानकारी सामने आई कि लोगों को अलग-अलग तरीकों से बैंक खाते उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया जाता था। ऐसे खातों को आमतौर पर म्यूल अकाउंट कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर अपराध से प्राप्त धन को इधर-उधर करने के लिए किया जाता है।
पुलिस के मुताबिक कुछ लोगों को बैंक खाता उपलब्ध कराने के बदले रकम देने का लालच दिया जाता था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, एक खाताधारक को एक बैंक खाता उपलब्ध कराने के एवज में करीब 8 हजार रुपये दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद बैंक खाते, यूपीआई एक्सेस और सिम कार्ड से जुड़ी जानकारी कथित तौर पर नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक पहुंचाई जाती थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क के कुछ तार बिहार के नालंदा से जुड़े हो सकते हैं। पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि हरिद्वार और उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों से जुटाए गए बैंक खातों और डिजिटल एक्सेस का इस्तेमाल नालंदा स्थित कथित साइबर नेटवर्क द्वारा किस प्रकार किया जा रहा था।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों को साइबर फ्रॉड से प्राप्त रकम का केवल एक निश्चित हिस्सा या कमीशन मिलने की बात भी पूछताछ में सामने आई है। हालांकि इस संबंध में सभी वित्तीय लेनदेन की डिजिटल फॉरेंसिक जांच की जा रही है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
2.75 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध ट्रांजेक्शन की जांच
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रारंभिक जांच के दौरान पुलिस को 2.75 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध डिजिटल लेनदेन के सुराग मिले हैं। इन लेनदेन की जांच के लिए बैंक खातों की विस्तृत जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस यह पता करेगी कि यह रकम किन स्रोतों से आई, किन खातों में भेजी गई और अंततः किन लोगों ने इसे निकाला या प्राप्त किया।
यहां यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि जांच के दौरान सामने आए संदिग्ध ट्रांजेक्शन की कुल राशि और वास्तविक साइबर ठगी की राशि में अंतर हो सकता है। पुलिस डिजिटल फॉरेंसिक, बैंक रिकॉर्ड और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेगी। जांच के बाद ही यह तय हो सकेगा कि नेटवर्क ने कुल कितनी रकम की ठगी की और इसमें कितने लोग शामिल थे।
हरिद्वार के एसएसपी नवनीत सिंह भुल्लर ने बताया कि इस मामले में अभी जांच जारी है और नेटवर्क से जुड़े अन्य आरोपियों की भी तलाश की जा रही है। पुलिस खाताधारकों की भूमिका की भी जानकारी जुटा रही है। जिन लोगों के नाम पर बैंक खाते मिले हैं, उनसे पूछताछ कर यह पता लगाया जाएगा कि उन्होंने अपने खाते और बैंकिंग सुविधाएं किस परिस्थिति में उपलब्ध कराईं।
पुलिस टीम को बिहार भेजने की तैयारी भी की जा रही है, ताकि नालंदा और अन्य स्थानों पर नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंचा जा सके। आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच यह कार्रवाई एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करती है कि अपराधी अब केवल फर्जी कॉल या ऑनलाइन लिंक के जरिए ही ठगी नहीं कर रहे, बल्कि बैंक खातों, सिम कार्ड, यूपीआई और डिजिटल पेमेंट सिस्टम का इस्तेमाल करते हुए संगठित नेटवर्क भी खड़ा कर रहे हैं। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद अब जांच का सबसे बड़ा फोकस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने और साइबर ठगी से जुड़े वास्तविक मास्टरमाइंड तक पहुंचने पर है।
फिलहाल पांचों आरोपियों से पूछताछ जारी है और बरामद मोबाइल फोन, लैपटॉप, बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि जैसे-जैसे नए तथ्य सामने आएंगे, उसी आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ कई और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
