देवप्रयाग के पवित्र संगम के पास नदी में कथित तौर पर बहाया जा रहा था अनुपचारित सीवेज और गंदा पानी, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित की याचिका पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने लिया संज्ञान
देहरादून/देवप्रयाग। उत्तराखंड की पवित्र नदियों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। टिहरी गढ़वाल जिले के देवप्रयाग में भागीरथी नदी में कथित तौर पर अनुपचारित सीवेज और सेप्टेज छोड़े जाने के मामले में एनजीटी की प्रधान पीठ ने देवप्रयाग नगर पालिका परिषद से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि देवप्रयाग वही पवित्र स्थल है जहां भागीरथी और अलकनंदा नदियों का संगम होकर गंगा का निर्माण होता है।
बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित प्रियांक कर्नाटक की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधिकरण ने पर्यावरणीय मानकों के पालन को लेकर चिंता जताई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि देवप्रयाग संगम के आसपास सार्वजनिक शौचालयों और सिविल लाइंस क्षेत्र की नालियों से निकलने वाला गंदा पानी तथा अपशिष्ट बिना उचित उपचार के सीधे भागीरथी नदी में पहुंच रहा है।
पवित्र भागीरथी में गंदा पानी जाने का आरोप
याचिका में देवप्रयाग को एक महत्वपूर्ण धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल बताते हुए कहा गया है कि यहां देशभर से श्रद्धालु और तीर्थयात्री पहुंचते हैं। भागीरथी और अलकनंदा के संगम के कारण देवप्रयाग का धार्मिक महत्व बेहद खास है। ऐसे में नदी में कथित रूप से अनुपचारित सीवेज का प्रवाह पर्यावरण के साथ-साथ श्रद्धालुओं की आस्था से भी जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
याचिका के अनुसार, तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए ओकरनंद पब्लिक स्कूल के नीचे, देवप्रयाग संगम के समीप सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया गया था। आरोप है कि इन शौचालयों से निकलने वाला अपशिष्ट और आसपास के सिविल लाइंस क्षेत्र की नालियों से आने वाला गंदा पानी उचित ट्रीटमेंट के बिना भागीरथी नदी में छोड़ा जा रहा है।
अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल नदी की स्वच्छता के लिए चिंता का विषय होगा, बल्कि इससे जलीय पर्यावरण और नदी पर निर्भर लोगों के लिए भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
NGT ने माना- पर्यावरण मानकों से जुड़ा गंभीर मुद्दा
मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने माना कि याचिका में पर्यावरणीय मानदंडों के अनुपालन से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। इसके बाद न्यायाधिकरण ने मामले में संबंधित विभागों और अधिकारियों को पक्षकार बनाया है।
एनजीटी ने टिहरी गढ़वाल के जिला मजिस्ट्रेट, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव, उत्तराखंड के पर्यावरण सचिव और देवप्रयाग नगर पालिका परिषद को उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी के माध्यम से प्रतिवादी बनाया है।
न्यायाधिकरण की ओर से सभी संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए गए हैं। आवेदक को निर्देश दिया गया है कि वह सभी प्रतिवादियों को नोटिस की तामील कराए और अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले इसकी तामील से संबंधित हलफनामा दाखिल करे।
देवप्रयाग नगर पालिका को देनी होगी पूरी रिपोर्ट
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण निर्देश देवप्रयाग नगर पालिका परिषद को दिया गया है। एनजीटी ने नगर पालिका को शिकायत में लगाए गए उन आरोपों के संबंध में व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है, जिनमें भागीरथी नदी में अनुपचारित सीवेज और सेप्टेज के कथित निर्वहन की बात कही गई है।
नगर पालिका की रिपोर्ट के जरिए यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में संबंधित क्षेत्र से निकलने वाले सीवेज और गंदे पानी के निस्तारण की क्या व्यवस्था है। साथ ही यह भी सामने आएगा कि सीवेज को नदी में जाने से रोकने के लिए ट्रीटमेंट की क्या व्यवस्था की गई है और वर्तमान व्यवस्था पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप है या नहीं।
अब इस मामले में संबंधित विभागों और स्थानीय निकाय की रिपोर्ट पर सभी की नजरें रहेंगी।
देवप्रयाग में गंगा बनने से बढ़ जाती है जिम्मेदारी
देवप्रयाग केवल उत्तराखंड का एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति और गंगा की धार्मिक आस्था में इसका विशेष स्थान है। मान्यता के अनुसार, यहीं भागीरथी और अलकनंदा का संगम होकर गंगा नदी का स्वरूप लेता है। ऐसे में संगम क्षेत्र और उससे जुड़ी नदियों की स्वच्छता बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा और धार्मिक पर्यटन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। देवप्रयाग भी तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के प्रमुख पड़ावों में शामिल है। ऐसे में बढ़ती आबादी और पर्यटन गतिविधियों के बीच सीवेज प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था बेहद जरूरी हो जाती है।
नदी में सीधे गंदा पानी जाने की शिकायतें सामने आने पर यह सवाल भी उठता है कि स्थानीय स्तर पर सीवेज ट्रीटमेंट और ठोस-तरल अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
नगर पालिका से लेकर प्रशासन तक की भूमिका अहम
इस मामले में अब देवप्रयाग नगर पालिका परिषद के साथ-साथ जिला प्रशासन और पर्यावरण से जुड़े विभागों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। एनजीटी द्वारा टिहरी गढ़वाल के जिलाधिकारी और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत संबंधित अधिकारियों को मामले में शामिल किए जाने से यह स्पष्ट है कि मामले को केवल स्थानीय शिकायत के तौर पर नहीं देखा जा रहा है।
देवप्रयाग नगर पालिका परिषद की वर्तमान अध्यक्ष ममता देवी हैं। वहीं देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व विधायक विनोद कंडारी करते हैं। टिहरी गढ़वाल जिले की प्रशासनिक जिम्मेदारी जिलाधिकारी नितिका खंडेलवाल के पास है। मामले में अब प्रशासनिक और स्थानीय निकाय स्तर से सामने आने वाली रिपोर्ट अहम मानी जा रही है।
16 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
एनजीटी ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की है। इस सुनवाई में संबंधित पक्षों की ओर से दाखिल रिपोर्ट और जवाब महत्वपूर्ण होंगे। खास तौर पर देवप्रयाग नगर पालिका की ओर से प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट से यह पता चल सकेगा कि भागीरथी नदी में कथित सीवेज डिस्चार्ज की स्थिति क्या है और इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
फिलहाल एनजीटी की कार्रवाई ने देवप्रयाग में नदी संरक्षण, सीवेज प्रबंधन और पर्यावरणीय मानकों के पालन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अब निगाहें नगर पालिका और संबंधित विभागों की रिपोर्ट पर टिकी हैं।
पवित्र संगम की पहचान रखने वाले देवप्रयाग में भागीरथी को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि स्थानीय निकाय, नागरिकों और श्रद्धालुओं की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। एनजीटी की सख्ती के बाद उम्मीद है कि इस मामले में वास्तविक स्थिति सामने आएगी और यदि कहीं भी नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो उसे रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।
