देहरादून/हरिद्वार। हरिद्वार में प्रस्तावित अर्धकुंभ 2027 अभी करीब एक वर्ष दूर है, लेकिन उससे पहले ही संत समाज के भीतर विवादों का ऐसा दौर शुरू हो गया है, जिसने पूरे धार्मिक जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पहले अर्धकुंभ की मान्यता को लेकर सरकार और संतों के बीच मतभेद सामने आए, फिर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद दो गुटों में बंट गई और अब नया उदासीन अखाड़े में ‘असली और नकली देवी-देवताओं’ को लेकर छिड़ा विवाद इस धार्मिक आयोजन के केंद्र में आ गया है।
स्थिति ऐसी बन गई है कि अब सवाल केवल इस बात का नहीं रह गया कि अर्धकुंभ की अध्यक्षता कौन करेगा, बल्कि यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस महापर्व का संचालन किस नेतृत्व में होगा और क्या धार्मिक परंपराओं को लेकर उठे सवालों का समय रहते समाधान निकल पाएगा।
अर्धकुंभ से पहले बढ़ा अखाड़ों का टकराव
हरिद्वार में आयोजित होने वाला अर्धकुंभ केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश और दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र होता है। हर छह वर्ष में होने वाला यह धार्मिक आयोजन सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। लेकिन इस बार तैयारियां शुरू होने से पहले ही संत समाज के भीतर नेतृत्व को लेकर गहरा मतभेद सामने आ गया है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, जिसे संत समाज की सबसे प्रभावशाली संस्था माना जाता है, फिलहाल दो गुटों में बंटी हुई दिखाई दे रही है। दोनों पक्ष स्वयं को वैध परिषद बताते हुए अर्धकुंभ के संचालन का अधिकार अपने पास होने का दावा कर रहे हैं। यही कारण है कि पूरे संत समाज में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
दो परिषद, दो अध्यक्ष और बहुमत की अलग-अलग दावेदारी
वर्तमान विवाद का सबसे बड़ा कारण अखाड़ा परिषद का नेतृत्व है। एक पक्ष निरंजनी अखाड़े से जुड़े महंत रविंद्र पुरी और महामंत्री हरिगिरि महाराज के नेतृत्व वाली परिषद को वैध बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष महानिर्वाणी सहित अन्य अखाड़ों के समर्थन के साथ स्वयं को वास्तविक परिषद होने का दावा कर रहा है।
दोनों गुट लगातार बैठकें आयोजित कर रहे हैं और अपने-अपने साथ अधिक अखाड़ों के समर्थन का दावा कर रहे हैं। एक पक्ष आठ से नौ अखाड़ों के समर्थन की बात करता है, जबकि दूसरा पक्ष दस अखाड़ों के समर्थन का दावा कर रहा है।
इस बहुमत की लड़ाई ने सरकार और मेला प्रशासन के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। प्रशासन के लिए यह तय करना आसान नहीं है कि आधिकारिक स्तर पर किस परिषद को मान्यता देकर उसके साथ समन्वय स्थापित किया जाए। फिलहाल मेला प्रशासन दोनों पक्षों से संवाद बनाए हुए है और किसी एक पक्ष के पक्ष में खुलकर सामने आने से बच रहा है।
नया मोड़: ‘असली और नकली देवताओं’ का विवाद
अखाड़ा परिषद के नेतृत्व का विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि नया उदासीन अखाड़े से जुड़ा एक नया विवाद सामने आ गया। पंजाब से आए कुछ साधु-संतों ने दावा किया कि हरिद्वार में वर्षों से जिन देवी-देवताओं की पूजा और शाही स्नान कराया जाता रहा है, वे वास्तविक नहीं हैं।
इन संतों का कहना है कि वास्तविक देवता पंजाब में सुरक्षित हैं और वहीं उनकी परंपरागत पूजा होती है। उन्होंने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि आगामी अर्धकुंभ में केवल वास्तविक देवताओं का ही शाही स्नान कराया जाना चाहिए।
यह दावा सामने आते ही संत समाज में नई बहस छिड़ गई। धार्मिक जगत में इस विषय को अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि इसका सीधा संबंध श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा है।
दूसरे पक्ष ने आरोपों को बताया निराधार
महानिर्वाणी गुट से जुड़े संतों ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावे केवल भ्रम फैलाने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।
उनके अनुसार आरोप लगाने वाले कुछ लोग पहले ही अखाड़ा विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित किए जा चुके हैं और अब दूसरे गुट का सहारा लेकर संत समाज में भ्रम की स्थिति पैदा करना चाहते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस प्रकार के आरोप लगातार लगाए जाते रहे तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर भी विचार किया जाएगा। उनका कहना है कि धार्मिक परंपराओं को राजनीतिक या व्यक्तिगत विवाद का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
स्वामी कैलाशानंद गिरि ने मांगी निष्पक्ष जांच
पूरे विवाद के बीच आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि नया उदासीन अखाड़े के कई संत उनके पास आए और उन्होंने अपनी बात रखी। एक आचार्य होने के नाते सभी पक्षों की बात सुनना उनका दायित्व है।
स्वामी कैलाशानंद गिरि ने कहा कि जब एक पक्ष यह दावा कर रहा है कि वास्तविक देवता उनके पास हैं और दूसरी ओर अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष भी जांच की मांग कर चुके हैं, तो उत्तराखंड सरकार को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए ताकि तथ्यों के आधार पर सच्चाई सामने आ सके।
“देवता कभी नकली नहीं हो सकते”
स्वामी कैलाशानंद गिरि ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज में ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि देवी-देवताओं के संबंध में इस प्रकार के विवाद खड़े किए जाएं।
उन्होंने कहा कि “देवता कभी नकली नहीं हो सकते। वे श्रद्धा और आस्था के केंद्र हैं। उनके संबंध में किसी भी प्रकार की अभद्र टिप्पणी या विवाद उचित नहीं माना जा सकता।”
उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर कोई भ्रम है तो उसका समाधान जांच और संवाद के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के जरिए।
संत समाज की प्रतिष्ठा बचाने की अपील
स्वामी कैलाशानंद गिरि ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता सनातन धर्म की गरिमा और संत समाज की प्रतिष्ठा है।
उन्होंने कहा कि जो संत वर्षों से परंपराओं का पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन कर रहे हैं, उनके सम्मान को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए।
उनका मानना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो जहां सच्चाई सामने आएगी, वहीं श्रद्धालुओं के बीच भी भ्रम की स्थिति समाप्त हो सकेगी।
सरकार और मेला प्रशासन के सामने कठिन चुनौती
अर्धकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन के सफल संचालन की जिम्मेदारी सरकार और मेला प्रशासन पर भी होती है।
लेकिन इस बार स्थिति सामान्य नहीं है। दोनों गुट अपने-अपने पक्ष में बहुमत होने का दावा कर रहे हैं और प्रशासन से संवाद भी कर रहे हैं।
मेला प्रशासन फिलहाल किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बच रहा है, लेकिन धार्मिक और प्रशासनिक बैठकों में किस गुट को प्राथमिकता दी जा रही है, इसे लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए आयोजन की तैयारियों को प्रभावित न होने दे।
मंत्री मदन कौशिक ने जताई समाधान की उम्मीद
हरिद्वार से विधायक एवं उत्तराखंड सरकार में मंत्री मदन कौशिक ने इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को उम्मीद है कि अर्धकुंभ शुरू होने से पहले अखाड़े आपसी संवाद के जरिए समाधान निकाल लेंगे।
उन्होंने कहा कि यह धार्मिक परंपराओं से जुड़ा विषय है और संत समाज इसकी बेहतर समझ रखता है।
मदन कौशिक ने यह भी कहा कि किसी का अहित नहीं होना चाहिए और सभी पक्षों को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित न हो।
धर्म विशेषज्ञों ने दी संवाद की सलाह
धर्म के जानकार प्रतीक मिश्र पुरी का कहना है कि अखाड़ों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी विभिन्न मुद्दों पर अखाड़ों के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं।
हालांकि उनका मानना है कि इस बार सार्वजनिक मंचों पर “असली परिषद”, “नकली परिषद”, “असली देवता” और “नकली देवता” जैसे आरोप लगना संत समाज की छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
उन्होंने कहा कि कुंभ और अर्धकुंभ केवल संतों का आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का महापर्व है। इसलिए सभी पक्षों को संवाद और पारंपरिक व्यवस्था के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए।
श्रद्धालुओं की आस्था सबसे बड़ी प्राथमिकता
हरिद्वार अर्धकुंभ में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनके लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आध्यात्मिक विश्वास का सबसे बड़ा केंद्र होता है।
ऐसे में यदि संत समाज के भीतर नेतृत्व और धार्मिक परंपराओं को लेकर विवाद लगातार सार्वजनिक होते रहे तो इसका असर श्रद्धालुओं की भावनाओं पर भी पड़ सकता है।
धर्माचार्यों का भी मानना है कि इस प्रकार के संवेदनशील विषयों का समाधान संस्थागत स्तर पर होना चाहिए ताकि समाज में भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बरकरार
अर्धकुंभ 2027 में अभी समय बाकी है, लेकिन विवादों की परतें लगातार गहरी होती जा रही हैं। अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर असमंजस, नया उदासीन अखाड़े का आंतरिक संघर्ष, देवी-देवताओं को लेकर उठे सवाल, विभिन्न अखाड़ों के बीच मतभेद और निष्पक्ष जांच की मांग ने आयोजन की तैयारियों पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
अब सबकी निगाहें उत्तराखंड सरकार, मेला प्रशासन और संत समाज पर टिकी हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इन विवादों का समाधान समय रहते कैसे निकले, ताकि अर्धकुंभ 2027 अपनी धार्मिक गरिमा, परंपराओं और आध्यात्मिक महत्व के साथ संपन्न हो सके तथा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
