नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है और इस बार राजनीतिक गलियारों में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयक, ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ (एक साथ चुनाव) तथा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) जैसे बड़े विधेयकों को संसद में पेश कर सकती है। हालांकि इन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार को केवल साधारण बहुमत नहीं, बल्कि दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। यही वजह है कि लोकसभा में ‘38+4’ का आंकड़ा इन दिनों राजनीतिक चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
लोकसभा की कुल प्रभावी सदस्य संख्या 543 मानी जाती है। किसी भी ऐसे विधेयक, जिसमें संविधान संशोधन की आवश्यकता हो, उसे पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साथ-साथ संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आवश्यक विशेष बहुमत की जरूरत होती है। सामान्य गणना के अनुसार यदि सभी सदस्य मौजूद रहें तो दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा लगभग 360 सांसदों तक पहुंचता है। मौजूदा समय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास लगभग 318 सांसदों का समर्थन माना जा रहा है। इनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 240 सांसदों के अलावा जनता दल (यूनाइटेड), तेलुगु देशम पार्टी, एकनाथ शिंदे गुट के शिवसेना सांसद तथा कुछ अन्य सहयोगी दल शामिल हैं।
यही वह स्थिति है जहां ‘38+4’ का गणित सामने आता है। यदि एनडीए के 318 सांसदों की तुलना आवश्यक 360 के आंकड़े से की जाए तो उसे लगभग 42 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। संसद में ऐसे दल, जो न तो एनडीए का हिस्सा हैं और न ही INDIA गठबंधन में शामिल हैं, उनके पास कुल 38 सांसद बताए जा रहे हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल (बीजेडी), भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और कुछ अन्य दलों के सांसद शामिल हैं। यदि इन सभी 38 सांसदों का समर्थन भी सरकार को मिल जाए, तब भी आवश्यक संख्या पूरी नहीं होगी। ऐसे में सरकार को INDIA गठबंधन के कम से कम चार सांसदों का अतिरिक्त समर्थन भी चाहिए होगा। इसी समीकरण को राजनीतिक विश्लेषक ‘38+4’ का गणित बता रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि विपक्षी गठबंधन INDIA पहले ही सरकार के कई प्रस्तावों का विरोध करता रहा है। ऐसे में विपक्ष के सांसदों का समर्थन जुटाना आसान नहीं माना जा रहा। हालांकि संसद में कई बार राजनीतिक परिस्थितियां और मुद्दों के आधार पर दलों का रुख बदलता भी देखा गया है। इसलिए सभी दलों की रणनीति पर नजर बनी हुई है।
इस बीच एक और संभावना पर भी चर्चा हो रही है। यदि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के आठ सांसद किसी विशेष विधेयक पर सरकार का समर्थन करते हैं तो एनडीए की कमी 42 से घटकर 34 सांसदों तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में गैर-एनडीए और गैर-INDIA दलों के 38 सांसदों का समर्थन मिलने पर सरकार आवश्यक संख्या हासिल कर सकती है। हालांकि यह पूरी तरह राजनीतिक परिस्थितियों और मतदान के समय दलों के अंतिम रुख पर निर्भर करेगा।
दूसरा महत्वपूर्ण विकल्प डीएमके की भूमिका से जुड़ा माना जा रहा है। यदि डीएमके के सांसद किसी कारणवश मतदान में हिस्सा नहीं लेते और मतदान से दूर रहते हैं, तो लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या घटकर लगभग 518 रह जाएगी। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी कम होकर लगभग 346 रह जाएगा। यदि इस दौरान शरद पवार गुट के सांसदों का समर्थन भी सरकार को मिल जाता है तो एनडीए का आंकड़ा लगभग 326 तक पहुंच सकता है। इसके बाद सरकार को केवल 20 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की आवश्यकता रह जाएगी, जिसे जुटाना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।
एक तीसरा राजनीतिक समीकरण भी सामने रखा जा रहा है। यदि डीएमके के अलावा लगभग 30 अन्य सांसद भी मतदान के दौरान अनुपस्थित रहते हैं, तो लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या घटकर लगभग 488 रह जाएगी। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 326 बन जाएगा। यदि एनडीए अपने मौजूदा सहयोगियों और संभावित अतिरिक्त समर्थन के साथ इस संख्या तक पहुंच जाता है तो संबंधित विधेयकों को पारित कराने की राह काफी आसान हो सकती है।
राज्यसभा की बात करें तो वहां एनडीए की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। उच्च सदन में सरकार समर्थक सांसदों की संख्या लगभग 150 बताई जा रही है, जबकि आवश्यक विशेष बहुमत के लिए करीब 161 सांसदों का समर्थन चाहिए। यानी सरकार को केवल 11 अतिरिक्त सांसदों की जरूरत होगी। राज्यसभा में ऐसे दलों के लगभग 24 सांसद हैं, जो किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। यदि इनमें से आधे सांसद भी सरकार का समर्थन करते हैं तो राज्यसभा में विशेष बहुमत का लक्ष्य हासिल करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
आगामी मॉनसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही के लिहाज से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम माना जा रहा है। महिला आरक्षण, ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं। इन पर संसद के भीतर होने वाली बहस और मतदान से यह स्पष्ट होगा कि सरकार अपने सहयोगी दलों के साथ कितनी मजबूती से खड़ी है और विपक्ष किस प्रकार की रणनीति अपनाता है। फिलहाल सबसे अधिक चर्चा इसी ‘38+4’ के राजनीतिक गणित की हो रही है, जो यह तय कर सकता है कि सरकार अपने महत्वाकांक्षी विधेयकों को संसद से पारित करा पाएगी या नहीं।
