भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश की मुद्रा व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंकनोट्स का पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में ₹10 और ₹20 के मूल्यवर्ग के नोटों को पॉलीमर सामग्री पर छापकर सीमित स्तर पर परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में इन नोटों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है।
हालांकि, प्लास्टिक नोटों की चर्चा भारत में नई नहीं है। पिछले लगभग दो दशकों से इस विषय पर विचार-विमर्श चलता रहा है, लेकिन अब पहली बार ऐसा माना जा रहा है कि यह योजना वास्तविक रूप लेने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस खबर के सामने आने के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं—क्या प्लास्टिक नोट आने के बाद कागजी नोट बंद हो जाएंगे? क्या पुराने नोट बदलने होंगे? प्लास्टिक नोट आखिर होते कैसे हैं? इनके क्या फायदे हैं और दुनिया के किन देशों में इनका उपयोग पहले से हो रहा है? आइए इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
क्या होते हैं प्लास्टिक या पॉलीमर बैंकनोट?
पॉलीमर बैंकनोट ऐसे नोट होते हैं जिन्हें पारंपरिक कपास आधारित कागज पर नहीं बल्कि विशेष प्रकार के लचीले प्लास्टिक (पॉलीमर) पर छापा जाता है। हालांकि इन्हें प्लास्टिक नोट कहा जाता है, लेकिन ये सामान्य प्लास्टिक शीट या एटीएम कार्ड की तरह कठोर नहीं होते। ये हल्के, मुलायम और आसानी से मोड़े जा सकने वाले होते हैं।
इन नोटों को इस तरह तैयार किया जाता है कि वे रोजमर्रा के उपयोग में अधिक टिकाऊ साबित हों। बारिश, नमी, धूल, गंदगी और लगातार हाथों से उपयोग होने के बावजूद इनकी गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों ने पिछले कुछ वर्षों में कागजी नोटों की जगह पॉलीमर नोटों को अपनाया है।
क्या बंद हो जाएगी कागजी करेंसी?
प्लास्टिक नोटों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इनके आने के बाद मौजूदा कागजी नोट पूरी तरह बंद हो जाएंगे? इसका जवाब है—नहीं।
RBI की प्रस्तावित योजना के अनुसार, पॉलीमर नोटों को चरणबद्ध तरीके से लाया जाएगा। शुरुआती दौर में केवल कुछ मूल्यवर्ग के नोटों का सीमित क्षेत्रों में परीक्षण होगा। इस दौरान मौजूदा कागजी नोट पूरी तरह वैध बने रहेंगे और सामान्य रूप से चलते रहेंगे।
यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तभी आगे चलकर बड़े पैमाने पर पॉलीमर नोट जारी किए जाएंगे। यानी आने वाले कई वर्षों तक कागजी और प्लास्टिक दोनों प्रकार की मुद्रा समानांतर रूप से चल सकती है। इसलिए आम लोगों को अपने पुराने नोट बदलने या किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होगी।
₹10 और ₹20 के नोटों से होगी शुरुआत
सूत्रों के अनुसार, RBI सबसे पहले ₹10 और ₹20 के नोटों को पॉलीमर सामग्री पर जारी करने की योजना बना रहा है। इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण है। छोटे मूल्यवर्ग के नोट बाजार में सबसे अधिक इस्तेमाल होते हैं और सबसे जल्दी खराब भी हो जाते हैं।
इन नोटों का उपयोग रोजमर्रा की खरीदारी, सार्वजनिक परिवहन, छोटे व्यापार और नकद लेन-देन में लगातार होता है। इसी वजह से इनकी औसत उम्र बहुत कम होती है और इन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। यदि यही नोट पॉलीमर पर छापे जाएं तो उनकी उपयोग अवधि कई गुना बढ़ सकती है, जिससे सरकार और RBI दोनों की लागत कम होगी।
प्लास्टिक नोटों के सबसे बड़े फायदे
पॉलीमर बैंकनोट्स को अपनाने के पीछे सबसे बड़ी वजह उनकी मजबूती और लंबी उम्र है। सामान्य कागजी नोट जल्दी फट जाते हैं, गंदे हो जाते हैं और नमी के कारण खराब हो जाते हैं, जबकि प्लास्टिक नोट इन समस्याओं से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं।
इन नोटों की सतह पानी से प्रभावित नहीं होती, इसलिए बारिश या नमी में इनके खराब होने की संभावना बहुत कम रहती है। साथ ही इनमें धूल और गंदगी भी अपेक्षाकृत कम जमती है।
एक और महत्वपूर्ण फायदा यह है कि पॉलीमर नोटों में आधुनिक सुरक्षा तकनीकों को शामिल करना आसान होता है। इनमें पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, विशेष सुरक्षा धागे, माइक्रो प्रिंटिंग और अन्य हाई-टेक फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जिससे नकली नोट बनाना काफी कठिन हो जाता है।
इसके अलावा, इन नोटों की आयु कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। इसका सीधा लाभ यह होगा कि नए नोटों की छपाई पर होने वाला खर्च कम होगा और खराब नोटों को बदलने की आवश्यकता भी घटेगी।
RBI क्यों ला रहा है प्लास्टिक नोट?
RBI के इस कदम के पीछे कई आर्थिक और प्रशासनिक कारण हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश में करेंसी की मांग लगातार बढ़ी है। इसके साथ ही नोट छापने का खर्च भी तेजी से बढ़ा है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में बैंकनोटों की छपाई पर लगभग 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि इससे पहले यह खर्च लगभग 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी केवल एक वर्ष में ही नोट छापने की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इसी तरह खराब होकर चलन से बाहर किए जाने वाले नोटों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025 में लगभग 23.8 अरब खराब नोटों को वापस लेना पड़ा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत से अधिक था।
इनमें सबसे अधिक संख्या ₹500 और ₹100 के नोटों की रही। यह स्थिति बताती है कि बार-बार नोट छापना RBI के लिए महंगा साबित हो रहा है। यदि अधिक टिकाऊ पॉलीमर नोटों का उपयोग किया जाए तो लंबे समय में छपाई और रिप्लेसमेंट की लागत में बड़ी बचत हो सकती है।
डिजिटल भुगतान बढ़ा, लेकिन नकदी की मांग बनी हुई
भारत में UPI और डिजिटल भुगतान प्रणाली ने पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है। इसके बावजूद नकदी का महत्व कम नहीं हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे व्यापारियों, स्थानीय बाजारों और दैनिक लेन-देन में नकद भुगतान अभी भी व्यापक रूप से किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 तक देश में प्रचलन में मौजूद मुद्रा का कुल मूल्य रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका था।
इससे स्पष्ट है कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी की आवश्यकता बनी हुई है। इसलिए RBI ऐसी मुद्रा विकसित करना चाहता है जो अधिक समय तक उपयोग में रहे और बार-बार बदलने की आवश्यकता न पड़े।
दुनिया के 60 से अधिक देशों में चल रहे हैं पॉलीमर नोट
भारत इस दिशा में अकेला देश नहीं है। दुनिया के 60 से अधिक देशों ने पूरी तरह या आंशिक रूप से पॉलीमर बैंकनोट्स को अपनाया है।
ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1988 में प्लास्टिक नोट जारी करने वाला दुनिया का पहला देश बना था। उसने सबसे पहले 10 डॉलर का पॉलीमर नोट जारी किया था। इसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम, रोमानिया, वियतनाम, ब्रुनेई, मालदीव, पापुआ न्यू गिनी और कई अन्य देशों ने भी पूरी तरह पॉलीमर नोट अपना लिए।
वहीं सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, हांगकांग, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मेक्सिको जैसे देशों में कुछ मूल्यवर्ग के नोट पॉलीमर पर जारी किए गए हैं जबकि अन्य नोट अभी भी कागज पर ही छापे जाते हैं।
इन देशों के केंद्रीय बैंकों का अनुभव बताता है कि पॉलीमर नोटों की लंबी उम्र, बेहतर सुरक्षा और कम रखरखाव लागत के कारण यह व्यवस्था आर्थिक रूप से अधिक लाभदायक साबित हुई है।
भारत में पहले भी हो चुकी है तैयारी
भारत में पॉलीमर नोटों की अवधारणा पहली बार वर्ष 2007 में सामने आई थी। उस समय RBI ने जयपुर, शिमला, कोच्चि, मैसूर और भुवनेश्वर जैसे शहरों में ₹10 के प्लास्टिक नोटों का परीक्षण करने की योजना बनाई थी।
इसके बाद 2012 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने लगभग एक अरब ₹10 के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी थी। 2016 में भी संसद में बताया गया था कि पॉलीमर नोटों को लाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है।
हालांकि, विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब एक बार फिर RBI इस दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है।
RBI गवर्नर ने क्या कहा?
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 5 जून 2026 को मॉनेटरी पॉलिसी समिति की बैठक के बाद कहा था कि पॉलीमर नोटों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है और इस संबंध में अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
उनके इस बयान के बाद अब आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी ने इस संभावना को और मजबूत कर दिया है कि केंद्रीय बैंक जल्द ही पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
यदि पॉलीमर नोट जारी किए जाते हैं तो आम नागरिकों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। मौजूदा कागजी नोट पहले की तरह वैध रहेंगे और बैंक, एटीएम तथा बाजारों में सामान्य रूप से स्वीकार किए जाएंगे।
नए प्लास्टिक नोट भी उसी तरह इस्तेमाल होंगे जैसे आज के नोट होते हैं। इन्हें मोड़ा जा सकेगा, जेब या पर्स में रखा जा सकेगा और एटीएम मशीनों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि लोगों को जल्दी फटने या खराब होने वाले नोटों की समस्या कम झेलनी पड़ेगी। साथ ही नकली नोटों पर भी काफी हद तक रोक लगाई जा सकेगी।
भविष्य की दिशा
RBI की यह पहल केवल नोट बदलने की योजना नहीं बल्कि भारतीय मुद्रा व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में देश के अधिक मूल्यवर्ग के नोट भी पॉलीमर सामग्री पर जारी किए जा सकते हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि भारत में प्लास्टिक और कागजी दोनों प्रकार की मुद्रा साथ-साथ चलेंगी। लेकिन अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और कम लागत वाली करेंसी की दिशा में यह कदम भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
