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Reading: जिला प्रशासन की अनूठी पहल: देहरादून में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को मिलेगा निःशुल्क उपचार; डीएम डॉ. आशीष चौहान ने शुरू किया महा-अभियान
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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > जिला प्रशासन की अनूठी पहल: देहरादून में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को मिलेगा निःशुल्क उपचार; डीएम डॉ. आशीष चौहान ने शुरू किया महा-अभियान
उत्तराखंडफीचर्ड

जिला प्रशासन की अनूठी पहल: देहरादून में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को मिलेगा निःशुल्क उपचार; डीएम डॉ. आशीष चौहान ने शुरू किया महा-अभियान

The Hill India News
Last updated: June 12, 2026 2:52 pm
The Hill India News
Published: June 12, 2026
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देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से स्वास्थ्य क्षेत्र और सामाजिक सरोकार से जुड़ी एक बेहद भावुक और राहत भरी खबर सामने आ रही है। जिला प्रशासन ने समाज के उस सबसे संवेदनशील और वंचित वर्ग की सुध ली है, जो अपने मासूम बच्चों की गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए पाई-पाई को मोहताज हैं। जिलाधिकारी (डीएम) डॉ. आशीष चौहान की संवेदनशीलता के चलते अब जिले के भीतर गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को मिलेगा निःशुल्क उपचार, चाहे उनके इलाज पर होने वाला खर्च कितना ही बड़ा क्यों न हो।

जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में निर्देश जारी किए हैं कि जनपद में कोई भी बच्चा केवल धन के अभाव या तंगहाली के कारण घुट-घुट कर जीने या दम तोड़ने को मजबूर नहीं होना चाहिए। प्रशासन ने जन्मजात और अत्यंत जटिल बीमारियों से ग्रसित ऐसे बच्चों के चिन्हीकरण (आइडेंटिफिकेशन) और उनके त्वरित इलाज की प्रक्रिया को ‘प्रायरिटी मोड’ पर संचालित करने का निर्णय लिया है, जिनके माता-पिता आर्थिक रूप से महंगे इलाज का बोझ उठाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

आयु वर्ग के हिसाब से बंटी जिम्मेदारी: बाल विकास और शिक्षा विभाग को कड़े निर्देश

इस महा-अभियान को धरातल पर पूरी तरह प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए जिलाधिकारी ने प्रशासनिक मशीनरी को दो अलग-अलग आयु वर्गों में विभाजित कर जिम्मेदारी सौंपी है, ताकि कोई भी पीड़ित बच्चा सर्वे से छूट न जाए:

  1. 0 से 06 वर्ष तक का आयु वर्ग: इस वर्ग के भीतर आने वाले नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों की पहचान करने का जिम्मा जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO), बाल विकास विभाग को दिया गया है। इसके तहत सभी आंगनबाड़ी केंद्रों की कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर डेटा जुटाने के निर्देश दिए गए हैं।

  2. 06 से 18 वर्ष तक का आयु वर्ग: इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाले स्कूली बच्चों और किशोरों की पहचान के लिए मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) देहरादून को कमान सौंपी गई है। सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के माध्यम से ऐसे बीमार बच्चों की सूची तैयार की जा रही है।

जिलाधिकारी ने दोनों विभागों के आला अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे कागजी औपचारिकताओं से बाहर निकलकर फील्ड में उतरें और जन्मजात विकृतियों, कैंसर, दिल की बीमारी, या न्यूरोलॉजिकल विकारों जैसी गंभीर व्याधियों से पीड़ित बच्चों की मुकम्मल जानकारी जल्द से जल्द कलेक्ट कर जिला मुख्यालय को सौंपें।

इलाज के बजट का ब्लूप्रिंट: आरबीएसके (RBSK) से लेकर ‘राइफल फंड’ तक का होगा इस्तेमाल

अक्सर सरकारी घोषणाएं बजट के अभाव में दम तोड़ देती हैं, लेकिन इस बार देहरादून जिला प्रशासन ने वित्तीय बैकअप की भी पुख्ता घेराबंदी की है। डीएम डॉ. आशीष चौहान ने इलाज के लिए उपलब्ध सरकारी और गैर-सरकारी बजटीय संसाधनों का पूरा खाका मीडिया के सामने रखा।

डीएम डॉ. आशीष चौहान का वक्तव्य: “हमारा पहला प्रयास यह होगा कि जितने भी बच्चे चिन्हित किए जा रहे हैं, उनका पूरा इलाज भारत सरकार के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के अंतर्गत पूरी तरह कैशलेस और निःशुल्क कराया जाए। लेकिन हम यहीं नहीं रुकेंगे; यदि कोई बीमारी इतनी जटिल या दुर्लभ है जो आरबीएसके के दायरे में नहीं आती, तो उसके लिए हम जिला प्रशासन के अन्य वित्तीय संसाधनों सहित ‘राइफल फंड’ (Rifle Fund) की राशि को तुरंत डायवर्ट करेंगे। मासूमों की जान बचाना हमारे लिए किसी भी नियम-कायदे से ऊपर है।”

प्रशासन के इस कड़े रुख का असर भी अब धरातल पर दिखने लगा है। जिलाधिकारी के निर्देशों के बाद महज कुछ ही दिनों के भीतर बाल विकास विभाग की टीमों ने सक्रियता दिखाते हुए जिले के विभिन्न कोनों से 06 वर्ष तक की आयु के 12 अति-गंभीर रूप से बीमार बच्चों को चिन्हित भी कर लिया है। इन सभी बच्चों की मेडिकल फाइलें तैयार कर ली गई हैं और स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर उनकी सर्जरी और आवश्यक चिकित्सकीय सहायता की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

यह केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि मानवीय दायित्व: डॉ. आशीष चौहान

समीक्षा बैठक के दौरान भावुक होते हुए डॉ. चौहान ने कहा कि बच्चों का स्वास्थ्य और उनका सुरक्षित भविष्य किसी भी कल्याणकारी सरकार और प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। यह अभियान केवल फाइलों को आगे बढ़ाने की कोई रूटीन प्रशासनिक कार्यवाही नहीं है, बल्कि समाज के सबसे लाचार और बेबस हिस्से के प्रति हमारे मानवीय दायित्वों का निर्वहन है।

उन्होंने मैदानी और पर्वतीय दोनों क्षेत्रों के विभागीय अधिकारियों को ताकीद की है कि दुर्गम इलाकों, मलिन बस्तियों और श्रमिक परिवारों के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाए, क्योंकि अक्सर अवेयरनेस की कमी के कारण ये लोग अपनी बीमारी को छिपा जाते हैं या नियति मानकर बैठ जाते हैं।

आम जनता से भावुक अपील: “आपकी एक सूचना बचा सकती है किसी मासूम की जिंदगी”

इस पुनीत कार्य को जन-आंदोलन बनाने के उद्देश्य से देहरादून जिला प्रशासन ने जनपदवासियों और सामाजिक संगठनों से भी एक बेहद मार्मिक और जिम्मेदार अपील की है। प्रशासन ने कहा है कि यदि किसी भी नागरिक के आस-पड़ोस, रिश्तेदारी या संज्ञान में कोई ऐसा बच्चा है जो किसी गंभीर या जन्मजात बीमारी से जूझ रहा है और आर्थिक तंगी के कारण तिल-तिल कर खत्म हो रहा है, तो उसकी सूचना तुरंत साझा करें।

सूचना कहाँ और कैसे दें?

  • अपने निकटतम आंगनबाड़ी केंद्र या कार्यकर्ता को बताएं।

  • संबंधित क्षेत्र के सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य या शिक्षक को अवगत कराएं।

  • नजदीकी राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में रिपोर्ट करें।

  • सीधे जिला कार्यक्रम अधिकारी या मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय में संपर्क करें।

निश्चित रूप से, देहरादून जिला प्रशासन का यह कदम उन सैकड़ों गरीब मां-बाप के लिए किसी भगवान के वरदान जैसा है, जो पैसों की कमी के कारण अपने बच्चों की आंखों के सामने दम तोड़ती उम्मीदों को देखने के लिए अभिशप्त थे। यदि यह अभियान पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ता है, तो देवभूमि की यह पहल पूरे देश के प्रशासनिक अमले के लिए एक नजीर साबित होगी।

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