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हरिद्वार कोर्ट ने कलयुगी पिता को सुनाई 10 साल की सजा, पैरोल पर बाहर आकर सगे खून से की थी दरिंदगी की कोशिश

हरिद्वार: उत्तराखंड के हरिद्वार जिले से रिश्तों को तार-तार करने वाला एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने समाज की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया है। एक कलयुगी पिता, जो पहले से ही अपनी चाची की दुष्कर्म के बाद हत्या करने के संगीन जुर्म में सजा काट रहा था, उसने पैरोल पर जेल से बाहर आते ही अपनी ही 9 साल की मासूम बेटी को हवस का शिकार बनाने का प्रयास किया। इस अत्यंत संवेदनशील और गंभीर मामले में हरिद्वार की विशेष अदालत ने आज, 10 जून को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी पिता को 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर 10 हजार रुपये का आर्थिक अर्थदंड भी लगाया है। राष्ट्रीय स्तर के कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे समाज में एक कड़ा संदेश देने वाला कदम बताया है।

कोरोना काल में पैरोल पर आया था बाहर, घर में ही बुन डाला साजिश का जाल

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि बेहद खौफनाक और आपराधिक प्रवृत्तियों से भरी हुई है। शासकीय अधिवक्ता भूपेंद्र चौहान ने मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि दोषी पिता पहले से ही एक बेहद जघन्य अपराध में जेल की सलाखों के पीछे था। उसने पूर्व में अपने पड़ोस में रहने वाली सगी चाची के साथ दुष्कर्म किया था और पकड़े जाने के डर से उसकी बेरहमी से हत्या कर दी थी। उस मामले में भी अदालत ने उसे दोषी पाते हुए सजा सुनाई थी।

विवाद और अपराध का अगला अध्याय तब शुरू हुआ जब वैश्विक महामारी कोरोना काल के दौरान देशव्यापी लॉकडाउन लगा। उस समय अदालतों और जेल प्रशासन की गाइडलाइंस के तहत कैदियों की भीड़ कम करने के लिए दोषी को पैरोल (अस्थायी रिहाई) दी गई थी। जेल की चहारदीवारी से बाहर आने के बाद भी उसकी आपराधिक और विकृत मानसिकता में कोई सुधार नहीं आया। उसने समाज और परिवार के बीच रहकर सुधरने के बजाय अपने ही घर के भीतर, अपने सगे खून को अपनी हवस का निशाना बनाने की घिनौनी साजिश रच डाली।

लगातार मानसिक और शारीरिक शोषण, सहमी मासूम ने मां को बताई आपबीती

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घिनौना कृत्य कोई एक दिन की घटना नहीं था। हरिद्वार के श्यामपुर थाना क्षेत्र में 7 अक्टूबर 2022 से यह सिलसिला लगातार चल रहा था। आरोपी पिता घर में अपनी ही 9 वर्षीय नाबालिग बेटी का लगातार मानसिक और शारीरिक शोषण कर रहा था। आरोपी इस बात का फायदा उठाता था कि जब भी उसकी पत्नी किसी काम से बाहर जाती या घर में बच्ची अकेली होती, तो वह गलत नीयत से उसके साथ छेड़खानी और दुष्कर्म का प्रयास करता था।

मासूम बच्ची इस खौफनाक बर्ताव से इस कदर सहम गई थी कि वह अपने ही घर में कैद होकर रह गई। कई बार बच्ची ने सूझबूझ दिखाते हुए किसी तरह पिता के चंगुल से भागकर अपनी जान बचाई। आखिरकार, जब प्रताड़ना और खौफ की सारी हदें पार हो गईं, तो पीड़ित मासूम ने हिम्मत जुटाई और रोते हुए अपनी मां को पिता की सारी काली करतूतों की आपबीती सुना दी। उसने बताया कि कैसे उसका सगा पिता ही उसके लिए सबसे बड़ा काल बन चुका है।

आधी रात को चीख-पुकार: मां ने बमुश्किल बचाई बेटी की आबरू

मामले में निर्णायक मोड़ 7 अक्टूबर 2022 की आधी रात को आया। शिकायतकर्ता पत्नी ने पुलिस को दी गई तहरीर में बताया कि उस रात उसकी बेटी गहरी नींद में सो रही थी। तभी अंधेरे का फायदा उठाकर आरोपी पति ने सोती हुई मासूम बेटी के बिस्तर पर जाकर उसके साथ अश्लील हरकतें शुरू कर दीं और जबरन दुष्कर्म करने का प्रयास किया। बच्ची अचानक इस हमले से घबरा गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने पिता की इस घिनौनी हरकत का पूरी ताकत से विरोध किया और जोर-जोर से शोर मचाना शुरू कर दिया।

बेटी की चीख-पुकार सुनकर बगल में सो रही मां की आंख खुल गई। जब उसने सामने का मंजर देखा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। शिकायतकर्ता माता ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए संघर्ष किया और बड़ी मुश्किल से अपनी तड़पती हुई पीड़ित बेटी को उस कलयुगी पिता के चंगुल से छुड़ाया। जब पत्नी ने इस घिनौने कृत्य का कड़ा विरोध किया और पुलिस में जाने की बात कही, तो दरिंदे पति ने आपा खो दिया। उसने अपनी पत्नी के साथ बेरहमी से मारपीट की और शोर मचाने या किसी को बताने पर दोनों को जान से मारने की सीधी धमकी दी।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई: पॉक्सो एक्ट में दर्ज हुआ था मुकदमा

इस घटना के बाद पीड़िता की मां बिना डरे और बिना किसी सामाजिक दबाव के सीधे श्यामपुर थाने पहुंची और अपने ही पति के खिलाफ नामजद शिकायत दर्ज कराई। मामले की संवेदनशीलता और 9 साल की मासूम बच्ची की सुरक्षा को देखते हुए हरिद्वार पुलिस ने बिना एक पल गंवाए तत्काल हरकत में आते हुए आरोपी पिता के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) और आईपीसी की संबंधित गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए आरोपी पिता को उसी दिन गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया था, ताकि वह गवाहों या पीड़ित परिवार को डरा-धमका न सके।

गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों से मजबूत हुआ सरकारी पक्ष

अदालत के भीतर चले इस लंबे ट्रायल में सरकारी पक्ष ने मामले को बेहद मजबूती और पेशेवर तरीके से पेश किया। शासकीय अधिवक्ता भूपेंद्र चौहान के नेतृत्व में सरकारी पक्ष ने अदालत के समक्ष पुख्ता वैज्ञानिक साक्ष्य, मेडिकल रिपोर्ट और कुल आठ महत्वपूर्ण गवाह पेश किए। इसके अलावा, अदालत की संतुष्टि के लिए कोर्ट की ओर से भी एक स्वतंत्र गवाह को परीक्षित किया गया।

बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपी को बचाने के लिए कई दलीलें दीं और इसे पारिवारिक विवाद बताने की कोशिश की, लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए अकाट्य साक्ष्यों और पीड़ित मासूम के कोर्ट में दर्ज बयानों के सामने बचाव पक्ष की एक न चली।

अपर सत्र न्यायाधीश चंद्रमणि राय की अदालत का बड़ा फैसला

दोनों पक्षों की लंबी बहस, गवाहों के बयानों और पत्रावली पर उपलब्ध अकाट्य साक्ष्यों का बारीकी से अनुशीलन करने के बाद, अपर सत्र न्यायाधीश चंद्रमणि राय की अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। माननीय न्यायाधीश ने आरोपी पिता को अपनी सगी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म के प्रयास के संगीन जुर्म का दोषी पाया।

न्यायालय ने दोषी को 10 वर्ष के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा सुनाई। साथ ही, उस पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि दोषी पिता निर्धारित जुर्माना राशि जमा करने में विफल रहता है, तो उसे एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने राहत की सांस ली है और इसे कानून की जीत बताया है।

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