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Reading: Almora: “मानव सेवा सर्वोपरि”: मनोज भाकुनी ने रक्तदान कर बचाई मरीज की जान
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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > Almora: “मानव सेवा सर्वोपरि”: मनोज भाकुनी ने रक्तदान कर बचाई मरीज की जान
उत्तराखंडफीचर्ड

Almora: “मानव सेवा सर्वोपरि”: मनोज भाकुनी ने रक्तदान कर बचाई मरीज की जान

The Hill India News
Last updated: October 29, 2025 2:05 pm
The Hill India News
Published: October 29, 2025
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अल्मोड़ा, 29 अक्तूबर: अल्मोड़ा जिले में मानवता की एक प्रेरक मिसाल देखने को मिली जब मनोरमा डबराल जन कल्याण समिति के फील्ड कर्मचारी मनोज भाकुनी ने संकट की घड़ी में एक मरीज को रक्तदान कर उसकी जान बचाई। मरीज कुंती देवी, जो गंभीर रूप से बीमार थीं, को तत्काल रक्त की आवश्यकता थी, परंतु जिले में आवश्यक रक्त समूह उपलब्ध नहीं हो सका। ऐसे में मनोज भाकुनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना रक्त देकर मरीज को नई ज़िंदगी दी।

Contents
अल्मोड़ा में संकट की घड़ी में दिखी इंसानियत की चमक“मानव सेवा सर्वोपरि” — संस्था के सिद्धांतों को किया साकाररक्तदान: जीवनदान का सर्वोच्च रूपसंस्था की पृष्ठभूमि और सामाजिक योगदानमनोज भाकुनी बने स्थानीय नायकसमाज को प्रेरित करने वाला उदाहरण“एक रक्तदान – कई जीवनों का सम्मान”

अल्मोड़ा में संकट की घड़ी में दिखी इंसानियत की चमक

मिली जानकारी के अनुसार, कुंती देवी का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया था। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें अत्यधिक खून की कमी हो गई है और तुरंत रक्त चढ़ाना आवश्यक है। परिवार ने ब्लड बैंक और विभिन्न सामाजिक संगठनों से संपर्क किया, लेकिन अल्मोड़ा में आवश्यक रक्त समूह नहीं मिल सका।

इसी दौरान मनोरमा डबराल जन कल्याण समिति के फील्ड कर्मचारी मनोज भाकुनी, जो क्षेत्र में फील्ड कार्य से लौट रहे थे, को स्थिति की जानकारी मिली। उन्होंने तुरंत अस्पताल पहुंचकर रक्तदान किया और इस मानवीय पहल से मरीज की जान बचाई गई।


“मानव सेवा सर्वोपरि” — संस्था के सिद्धांतों को किया साकार

इस नेक कार्य पर संस्था की अध्यक्ष कमला डबराल और संस्थापक राजेश डबराल ने मनोज भाकुनी की सराहना करते हुए कहा कि —

“हमारी संस्था का मूलमंत्र ही ‘मानव सेवा सर्वोपरि’ है, और मनोज ने इस भाव को कर्म में बदलकर दिखाया है। जब किसी की जान बचाने की बात आती है, तब हर संवेदनशील व्यक्ति को आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि यह घटना समाज के लिए एक प्रेरणा है कि छोटी-सी मानवता की पहल किसी के पूरे परिवार को नया जीवन दे सकती है।


रक्तदान: जीवनदान का सर्वोच्च रूप

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में हर साल लाखों मरीज रक्त की कमी के कारण संकट में पड़ते हैं। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में तो ब्लड बैंक की सीमित उपलब्धता के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
ऐसे में स्वैच्छिक रक्तदान ही इन कठिनाइयों का समाधान है।

मनोरमा डबराल जन कल्याण समिति जैसी संस्थाएँ न केवल सामाजिक कार्य कर रही हैं, बल्कि लोगों को रक्तदान, अंगदान और सामाजिक सहयोग के प्रति भी जागरूक कर रही हैं। संस्था के कार्यकर्ता नियमित रूप से ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य शिविर, जनजागरूकता अभियान और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं।


संस्था की पृष्ठभूमि और सामाजिक योगदान

मनोरमा डबराल जन कल्याण समिति पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में कृषि, समाजसेवा, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में अग्रणी भूमिका निभा रही है।

संस्थापक राजेश डबराल और अध्यक्ष कमला डबराल के नेतृत्व में यह संस्था लगातार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर ग्रामीण विकास की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही है।


मनोज भाकुनी बने स्थानीय नायक

अस्पताल प्रशासन और मरीज के परिजनों ने भी मनोज भाकुनी की इस पहल की सराहना की।
परिवारजनों ने भावुक होकर कहा —

“हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा था। मनोज जी ने जिस तरह मदद की, वह हमारे लिए भगवान से कम नहीं। उनके रक्तदान ने हमारी मां की जान बचा ली।”

मनोज भाकुनी ने मीडिया से बातचीत में कहा —

“मुझे यह जानकर संतोष मिला कि मेरे खून से किसी की जान बच सकी। मैं सभी लोगों से अपील करता हूँ कि वे भी समय-समय पर रक्तदान करें। यह सबसे बड़ा उपहार है जो हम किसी इंसान को दे सकते हैं।”


समाज को प्रेरित करने वाला उदाहरण

यह घटना न केवल अल्मोड़ा के लिए बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित किया है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
जहां लोग अक्सर स्वयं की व्यस्तता में दूसरों की पीड़ा से अनजान रहते हैं, वहीं मनोज भाकुनी जैसे लोग समाज में उम्मीद की किरण जगाते हैं।


“एक रक्तदान – कई जीवनों का सम्मान”

अल्मोड़ा की इस घटना ने यह संदेश दिया है कि संकट की घड़ी में यदि एक व्यक्ति भी संवेदनशीलता दिखा दे, तो कई परिवारों में मुस्कान लौट सकती है। मनोरमा डबराल जन कल्याण समिति का यह मानवीय अध्याय दर्शाता है कि “मानव सेवा सर्वोपरि” केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा है।

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