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बिहार महागठबंधन में सीटों पर सुलह नहीं, सहरसा से लेकर कहलगांव तक फंसा मामला

The Hill India News
Last updated: October 11, 2025 2:38 am
The Hill India News
Published: October 11, 2025
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पटना, 10 अक्टूबर 2025: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-लेफ्ट-आईआईपी) के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी तेज हो गई है। पटना में देर रात तक बैठकें जारी रहीं, लेकिन कई सीटों पर समझौता नहीं हो सका। खासकर सहरसा, कहलगांव, बायसी, बहादुरगंज और रानीगंज जैसी सीटें इस समय गठबंधन के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं।

Contents
सहरसा सीट: आईआईपी बनाम आरजेडी की दावेदारीकहलगांव: कांग्रेस का परंपरागत गढ़, आरजेडी की नजरसीमांचल की बायसी और बहादुरगंज पर घमासानरानीगंज: मामूली अंतर से हार, फिर भी विवादपांचों सीटें पिछली बार हार चुकी हैंबैठकें जारी, लेकिन हल दूरतेजस्वी यादव के चेहरे पर भी मतभेद‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ की उम्मीदविश्लेषण: महागठबंधन के लिए परीक्षा की घड़ी

सूत्रों के मुताबिक, दोनों दलों — आरजेडी और कांग्रेस — के नेता लगातार बातचीत कर रहे हैं, लेकिन पारंपरिक दावेदारी और लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर विवाद सुलझता नहीं दिख रहा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर जल्द कोई सहमति नहीं बनी तो यह खींचतान चुनावी तैयारी और सीट फाइनल करने की रणनीति को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।


सहरसा सीट: आईआईपी बनाम आरजेडी की दावेदारी

सहरसा सीट महागठबंधन की अंदरूनी राजनीति का सबसे जटिल केंद्र बन चुकी है। पहले खबर थी कि यह सीट कांग्रेस के हिस्से में जाएगी और आईआईपी (इंडिया इनक्लूसिव पार्टी) के आईपी गुप्ता यहां से उम्मीदवार होंगे। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अपने कोटे से आईआईपी को दो सीटें देने पर सहमत हुई थी।

लेकिन अब आरजेडी ने सहरसा पर अपना दावा ठोक दिया है, जिससे समीकरण बदल गए हैं।
दरअसल, पिछली बार सहरसा से बीजेपी के आलोक रंजन ने आरजेडी की लवली आनंद को करीब 20 हजार वोटों से हराया था। आरजेडी का तर्क है कि यह सीट उसके कोर वोट बैंक वाली है और वह यहां की सामाजिक समीकरणों को बेहतर समझती है। वहीं, कांग्रेस मानती है कि सीमांचल और कोसी इलाके में वह इस बार नए सामाजिक समीकरणों के सहारे मजबूत प्रदर्शन कर सकती है।


कहलगांव: कांग्रेस का परंपरागत गढ़, आरजेडी की नजर

कहलगांव की सीट पर भी मामला फंसा हुआ है। कांग्रेस इसे अपना परंपरागत गढ़ मानती है क्योंकि यहां लंबे समय तक सदानंद सिंह का दबदबा रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में यह सीट बीजेपी के खाते में गई थी, लेकिन कांग्रेस का दावा है कि “कहलगांव को छोड़ना आत्मघाती कदम होगा।”

आरजेडी इस सीट को अपने हिस्से में लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व साफ है कि “जहां कांग्रेस की ऐतिहासिक जड़ें हैं, वहां समझौता संभव नहीं।”
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस इस बार सीमांचल और कहलगांव जैसे इलाकों में लोकसभा प्रदर्शन के आधार पर बढ़ी पकड़ का हवाला देकर अधिक सीटें मांग रही है।


सीमांचल की बायसी और बहादुरगंज पर घमासान

सीमांचल की राजनीति हमेशा से बिहार की राजनीति में निर्णायक मानी जाती रही है। यही कारण है कि बायसी और बहादुरगंज सीटों पर भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच तनातनी है।
कांग्रेस का कहना है कि सीमांचल में उसने लोकसभा चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया है और यदि पप्पू यादव को साथ जोड़ दिया जाए तो कांग्रेस के पास इस क्षेत्र में तीन सांसद (किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया) हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,

“हमने सीमांचल में बीजेपी और एआईएमआईएम दोनों को चुनौती दी है। लोकसभा के नतीजों के आधार पर बायसी और बहादुरगंज हमें मिलनी चाहिए।”

ध्यान देने योग्य है कि बायसी और बहादुरगंज पिछली बार ओवैसी की पार्टी (एआईएमआईएम) ने जीती थीं, लेकिन बाद में दोनों विधायक आरजेडी में शामिल हो गए। अब कांग्रेस का कहना है कि “इन विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर विरोध है” और इसलिए पार्टी के नए उम्मीदवार यहां बेहतर परिणाम दे सकते हैं।


रानीगंज: मामूली अंतर से हार, फिर भी विवाद

रानीगंज सीट भी विवाद का केंद्र बनी हुई है। पिछली बार आरजेडी को यहां सिर्फ 2,500 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार पार्टी दोबारा यह सीट मांग रही है, लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि लगातार हारने वाली सीटों पर “रोटेशन पॉलिसी” अपनाई जानी चाहिए।

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा,

“हम हार से सीखकर नई रणनीति बना रहे हैं। पुराने चेहरों से आगे बढ़ने की जरूरत है।”

दूसरी तरफ आरजेडी का कहना है कि “रानीगंज और सहरसा हमारे संगठन के मजबूत क्षेत्र हैं, यहां टिकट हमारी पार्टी को ही मिलना चाहिए।”


पांचों सीटें पिछली बार हार चुकी हैं

दिलचस्प बात यह है कि जिन पांच सीटों (सहरसा, कहलगांव, बायसी, बहादुरगंज, रानीगंज) पर विवाद चल रहा है, उन सभी पर पिछली बार महागठबंधन के दल हार चुके हैं।
कहलगांव और बहादुरपुर कांग्रेस ने लड़ी थीं, जबकि सहरसा, बायसी और रानीगंज पर आरजेडी मैदान में थी।
विश्लेषकों का कहना है कि इस वजह से दोनों पार्टियां अब “रिस्क कम और रिजल्ट गारंटी” वाली सीटों पर दांव लगाना चाहती हैं, जिससे साझा सहमति बन पाना मुश्किल हो रहा है।


बैठकें जारी, लेकिन हल दूर

पटना स्थित आरजेडी मुख्यालय में गुरुवार और शुक्रवार को लगातार कई दौर की बैठकें हुईं। देर रात तक तेजस्वी यादव, अशोक गहलोत, जगदानंद सिंह और शकील अहमद खान समेत कई नेताओं के बीच चर्चा चली।
हालांकि, अभी तक किसी भी सीट पर औपचारिक ऐलान नहीं किया गया है।

सूत्रों के अनुसार, गठबंधन के नेता “सीटों का अनुपात” 2:1 (आरजेडी:कांग्रेस) रखने पर सहमत हैं, लेकिन कौन-सी सीट किसे मिलेगी, इस पर मतभेद जारी है।


तेजस्वी यादव के चेहरे पर भी मतभेद

महागठबंधन की खींचतान केवल सीटों तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी असमंजस बना हुआ है।
अब तक आरजेडी ने तेजस्वी यादव को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। कांग्रेस इसे “रणनीतिक निर्णय” बता रही है, जबकि राजनीतिक हलकों में इसे आपसी मतभेद का संकेत माना जा रहा है।

कांग्रेस पर्यवेक्षक और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बयान दिया,

“मुख्यमंत्री चेहरे का एलान रणनीति का हिस्सा है। फिलहाल प्राथमिकता सीट बंटवारे पर है।”

हालांकि, पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस नहीं चाहती कि चुनाव से पहले पूरा श्रेय आरजेडी नेतृत्व को चला जाए।


‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ की उम्मीद

महागठबंधन के सहयोगी दलों में लेफ्ट पार्टियां और आईआईपी (इंडिया इनक्लूसिव पार्टी) भी शामिल हैं।
इन दलों के नेताओं का कहना है कि सीटों को लेकर चल रही यह खींचतान गठबंधन की “लोकतांत्रिक प्रक्रिया” का हिस्सा है।
एक वरिष्ठ वाम नेता ने कहा,

“विचार-विमर्श में देर हो सकती है, लेकिन अंतिम समझौता सभी की सहमति से होगा। देर आयद, दुरुस्त आयद।”


विश्लेषण: महागठबंधन के लिए परीक्षा की घड़ी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महागठबंधन के सामने यह चुनावी रणनीति से ज्यादा सामंजस्य की परीक्षा है।
2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने करीब 110 सीटें जीती थीं, जिनमें आरजेडी 75 और कांग्रेस 19 पर विजयी हुई थी।
इस बार कांग्रेस अधिक सीटें चाह रही है, जबकि आरजेडी अपने संगठनात्मक आधार के बल पर बड़ा हिस्सा बनाए रखना चाहती है।

अगर दोनों दलों में समय रहते सहमति नहीं बनी, तो इसका असर सीट वितरण से लेकर मतदाताओं में एकता की छवि तक पड़ सकता है।


सहरसा से लेकर कहलगांव और बायसी तक, बिहार महागठबंधन फिलहाल “आपसी तालमेल” की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। दोनों प्रमुख दल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए अड़े हैं, जबकि छोटी पार्टियां समाधान की उम्मीद लगाए बैठी हैं। अब देखना यह है कि ये रात-दिन चल रही बैठकें कब सहमति की सुबह लेकर आती हैं — या फिर महागठबंधन की एकता की डोर फिर से परीक्षा में पड़ जाती है।

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