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उत्तराखंडफीचर्ड

Uttarakhand: टिहरी में RRP ने आंदोलनकारी गंभीर सिंह कठैत को शहीद का दर्जा देने की मांग तेज की

The Hill India News
Last updated: September 20, 2025 1:51 pm
The Hill India News
Published: September 20, 2025
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टिहरी। उत्तराखंड के राज्य आंदोलन के वीर सपूतों के सम्मान को लेकर राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी (RRP) ने अपनी मुहिम और तेज कर दी है। शनिवार को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवप्रसाद सेमवाल, सुभाष नौटियाल और उत्तराखंड आंदोलनकारी मंच के कार्यकारी अध्यक्ष देवेंद्र नौडियाल ने टिहरी की जिलाधिकारी निकिता खंडेलवाल से मुलाकात कर स्वर्गीय गंभीर सिंह कठैत को उत्तराखंड आंदोलनकारी घोषित कर शहीद का दर्जा देने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा।

Contents
गंभीर सिंह कठैत का बलिदान और आंदोलन में भूमिकाआंदोलनकारी मंच की मांगRRP की प्रतिबद्धताअधिकारियों को सौंपा ज्ञापनसामाजिक और राजनीतिक महत्वस्थानीय प्रतिक्रिया

गंभीर सिंह कठैत का बलिदान और आंदोलन में भूमिका

RRP नेताओं ने बताया कि स्व. गंभीर सिंह कठैत टिहरी जिले के निवासी थे और उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान अहम भूमिका निभाई। वर्ष 2004 में नई टिहरी नगर में मुकदमा वापसी की मांग को लेकर हुए आंदोलन में गंभीर सिंह कठैत शहीद हो गए।

शिवप्रसाद सेमवाल ने कहा, “आज 2025 में भी गंभीर सिंह कठैत को न तो राज्य आंदोलनकारी घोषित किया गया है और न ही उन्हें शहीद का दर्जा मिला है। उनके साहस और बलिदान को आधिकारिक मान्यता मिलना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा कि गंभीर सिंह कठैत को 5 जनवरी 1994 और 28 मार्च 1994 को दो बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनके संघर्ष और योगदान को अब तक उचित सम्मान नहीं मिला।


आंदोलनकारी मंच की मांग

देवेंद्र नौडियाल ने कहा कि गंभीर सिंह कठैत का बलिदान उत्तराखंड के लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है। “दुर्भाग्य है कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी उन्हें आधिकारिक मान्यता नहीं मिली। उनकी माता द्वारा बार-बार यह मांग उठाई गई कि टिहरी के बौराड़ी स्टेडियम का नाम और उनकी प्रतिमा स्थापना उनके नाम पर की जाए, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।”

उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्तिगत सम्मान का मामला नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को राज्य आंदोलन के वीरों के बलिदान की प्रेरणा देने का मामला भी है।


RRP की प्रतिबद्धता

पार्टी नेता सुभाष नौटियाल ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी पूरी मजबूती से यह मांग उठाएगी कि स्व. कठैत को आंदोलनकारी और शहीद का दर्जा मिले। उन्होंने कहा, “इससे केवल उनके परिवार को सम्मान और पेंशन जैसी सुविधाएं ही नहीं मिलेंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उनके बलिदान को यादगार बनाया जा सकेगा।”

शिवप्रसाद सेमवाल ने कहा कि राज्य आंदोलन में अनेकों वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनके बलिदान के कारण वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन संभव हो सका। उन्होंने सरकार से मांग की कि गंभीर सिंह कठैत जैसे योद्धाओं को न्याय और सम्मान दिया जाए।


अधिकारियों को सौंपा ज्ञापन

RRP नेताओं ने जिलाधिकारी से मुलाकात के दौरान ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट किया कि सरकार को आवश्यक आदेश जारी करके गंभीर सिंह कठैत को आधिकारिक आंदोलनकारी और शहीद का दर्जा देना चाहिए। ज्ञापन में कहा गया कि उनके परिवार को पेंशन, सम्मान और सरकारी सुविधाएं प्रदान की जाएं।

इसके अलावा पार्टी ने इस मुद्दे को राज्य और राष्ट्रीय मीडिया में उठाने का आश्वासन भी दिया। पार्टी नेताओं ने जोर देकर कहा कि आंदोलनकारियों के सम्मान की लड़ाई को लगातार जारी रखा जाएगा और राज्य सरकार को इसके प्रति जिम्मेदार ठहराया जाएगा।


सामाजिक और राजनीतिक महत्व

विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारियों को उचित मान्यता न मिलना एक सामाजिक और ऐतिहासिक चुनौती है। ऐसा न होने पर युवा पीढ़ी में आंदोलन और देशभक्ति के महत्व को लेकर समझ में कमी आ सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के वीरों का सम्मान केवल ऐतिहासिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।


स्थानीय प्रतिक्रिया

स्थानीय लोगों ने भी RRP की पहल का स्वागत किया। ग्रामीणों ने कहा कि गंभीर सिंह कठैत जैसे वीरों का बलिदान हर उत्तराखंडी के लिए गर्व का विषय है। उनका कहना है कि राज्य आंदोलन के शहीदों को उचित सम्मान मिलने से समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा और युवा पीढ़ी में राज्यभक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।

टिहरी में RRP की यह पहल केवल एक आंदोलनकारी को शहीद घोषित कराने तक सीमित नहीं है। यह पूरे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के वीरों के सम्मान और उनके बलिदान को यादगार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

स्वर्गीय गंभीर सिंह कठैत के परिवार और समाज के लिए यह मामला न केवल समानता और न्याय का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए राज्य आंदोलन के इतिहास और वीरता को संरक्षित रखने का माध्यम भी बनता है।

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