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86 साल पुरानी किशाऊ परियोजना को मिली नई जिंदगी! छह राज्यों ने किया MoU, 15,000 करोड़ से ज्यादा की योजना से बदलेगा पानी-बिजली का पूरा गणित

The Hill India News
Last updated: September 15, 2026 11:37 am
The Hill India News
Published: September 15, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना आखिरकार एक बड़े निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दशकों से पानी के बंटवारे, परियोजना की लागत और बिजली उत्पादन से जुड़े वित्तीय दायित्वों के कारण अटकी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अब छह राज्यों की सहमति के बाद आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है। 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में किशाऊ परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) की प्रक्रिया हुई, जिसमें केंद्र के साथ हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान शामिल हैं।

Contents
1940 से चली आ रही कहानी, अब निर्णायक मोड़ परआखिर कहां फंस गई थी परियोजना?केंद्र सरकार उठाएगी जल घटक की 90 फीसदी लागत15,000 करोड़ से ज्यादा की परियोजना, 236 मीटर ऊंचा बांधबिजली उत्पादन से लेकर सिंचाई तक बड़े फायदेछह राज्यों के बीच होगा पानी और बिजली का बंटवाराहिमाचल को भी मिलेगा बड़ा लाभउत्तराखंड के लिए भी बड़ी उपलब्धिकरीब 5,000 लोगों के विस्थापन की चुनौती1940 से 2026 तक ऐसे बढ़ी किशाऊ परियोजना की कहानीअब आगे क्या होगा?यमुना के लिए भी अहम मानी जा रही परियोजना

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में जून 2026 में हुई उच्चस्तरीय बैठक में इस परियोजना को लेकर लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करने पर सहमति बनी थी। अब उसी सहमति को औपचारिक रूप देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। MoU के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाना है।

1940 से चली आ रही कहानी, अब निर्णायक मोड़ पर

किशाऊ बांध परियोजना कोई नई योजना नहीं है। इसकी अवधारणा करीब 1940 के आसपास सामने आई थी। इसके बाद परियोजना स्थल के सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन का दौर शुरू हुआ, लेकिन अलग-अलग समय पर कई कारणों से काम रुकता रहा।

पानी के बंटवारे, परियोजना की लागत, पर्यावरणीय मंजूरियों, तकनीकी बदलाव और राज्यों के बीच वित्तीय जिम्मेदारी तय न होने के कारण यह परियोजना लगातार आगे-पीछे होती रही। समय के साथ परियोजना की लागत भी काफी बढ़ गई।

किशाऊ परियोजना को लेकर 1990 के दशक में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई। बाद में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा भी मिला, लेकिन इसके बावजूद राज्यों के बीच सहमति का अभाव इसकी राह में सबसे बड़ी बाधा बना रहा।

अब छह राज्यों के एक साथ आने के बाद करीब आठ साल से चल रहा प्रमुख गतिरोध खत्म होने की उम्मीद जगी है।

आखिर कहां फंस गई थी परियोजना?

किशाऊ परियोजना का सबसे बड़ा विवाद इसके वित्तीय ढांचे और बिजली घटक की लागत को लेकर था। हिमाचल प्रदेश का तर्क था कि परियोजना उसकी भूमि और टौंस नदी पर बन रही है, इसलिए बिजली उत्पादन से जुड़ी लागत का पूरा या बड़ा वित्तीय बोझ हिमाचल पर नहीं डाला जाना चाहिए।

पुरानी व्यवस्था में हिमाचल प्रदेश के सामने लगभग 800 करोड़ रुपये के योगदान का मुद्दा था। राज्य सरकार ने इस वित्तीय जिम्मेदारी पर आपत्ति जताई। यही विवाद लंबे समय तक परियोजना के आगे बढ़ने में बाधा बना रहा।

जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में इसी मुद्दे का समाधान तलाशा गया। केंद्र सरकार ने जल घटक की लागत में बड़ी केंद्रीय सहायता देने पर सहमति बनाई। साथ ही हिमाचल प्रदेश के बिजली घटक से जुड़े वित्तीय बोझ को दूसरे लाभार्थी राज्यों के माध्यम से साझा करने की व्यवस्था पर सहमति बनी।

केंद्र सरकार उठाएगी जल घटक की 90 फीसदी लागत

किशाऊ परियोजना के लिए तैयार वित्तीय व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जल घटक की लागत का 90 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। बाकी 10 फीसदी वित्तीय भार छह सहभागी राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा।

इस व्यवस्था से हिमाचल प्रदेश पर परियोजना के जल घटक का बड़ा वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। वहीं हिमाचल के बिजली घटक की लागत को लेकर भी नई व्यवस्था तैयार की गई है। सहमति के अनुसार हिमाचल के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराने के बदले उसके बिजली घटक की लागत में योगदान किया जाएगा।

यही व्यवस्था वर्षों से चले आ रहे विवाद को खत्म करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

15,000 करोड़ से ज्यादा की परियोजना, 236 मीटर ऊंचा बांध

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना का प्रस्तावित निर्माण टौंस नदी पर होना है। टौंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी है और परियोजना हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र तथा उत्तराखंड की सीमा के पास प्रस्तावित है।

परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। अलग-अलग चरणों में लागत के अनुमान में बदलाव हुआ है और हालिया रिपोर्टों में यह आंकड़ा करीब 15,624 करोड़ रुपये तक बताया गया है।

प्रस्तावित बांध की ऊंचाई करीब 236 मीटर होगी। इतना ऊंचा बांध बनने के बाद यहां जल भंडारण के साथ बिजली उत्पादन, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति जैसे कई उद्देश्य पूरे किए जाने की योजना है।

बिजली उत्पादन से लेकर सिंचाई तक बड़े फायदे

किशाऊ परियोजना को सिर्फ बिजली उत्पादन की परियोजना नहीं माना जा रहा है। यह एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य पानी का भंडारण, सिंचाई, पेयजल उपलब्धता और जलविद्युत उत्पादन को एक साथ बढ़ावा देना है।

ताजा रिपोर्टों के अनुसार परियोजना से करीब 422 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन की क्षमता जुड़ी है। इससे पहले विभिन्न चरणों में परियोजना की प्रस्तावित क्षमता करीब 660 मेगावाट भी बताई गई थी। परियोजना के स्वरूप और क्षमता में समय के साथ बदलाव हुए हैं, इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में दोनों आंकड़े सामने आते हैं।

परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि में सिंचाई क्षमता विकसित होने की उम्मीद है। इसके अलावा पेयजल उपलब्धता बढ़ाने में भी यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

छह राज्यों के बीच होगा पानी और बिजली का बंटवारा

किशाऊ परियोजना का असर सिर्फ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। इसके लाभार्थी राज्यों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान शामिल हैं।

परियोजना का संबंध ऊपरी यमुना बेसिन से है, इसलिए इससे यमुना नदी के जल प्रबंधन को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार ने जून में हुई बैठक में इसे यमुना के पुनर्जीवन और नदी में स्वच्छ पानी के प्रवाह से भी जोड़ा था।

खास तौर पर दिल्ली और राजस्थान के लिए हिमाचल के पानी के हिस्से और बिजली घटक की लागत को लेकर बनी नई व्यवस्था इस समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हिमाचल को भी मिलेगा बड़ा लाभ

परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी चिंता उसके वित्तीय योगदान को लेकर थी। नई व्यवस्था के बाद राज्य को परियोजना से बिजली और पानी से जुड़े लाभ मिलेंगे, जबकि उसके ऊपर पहले प्रस्तावित वित्तीय बोझ नहीं रहेगा।

रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल को परियोजना के बिजली घटक से सालाना करीब 600 करोड़ रुपये के आसपास का लाभ मिलने का अनुमान है। साथ ही राज्य को जल हिस्सेदारी भी मिलने की व्यवस्था की गई है।

इस लिहाज से हिमाचल के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य को परियोजना में बड़े पूंजीगत निवेश के बिना बिजली से आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है।

उत्तराखंड के लिए भी बड़ी उपलब्धि

उत्तराखंड के लिए किशाऊ परियोजना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका निर्माण राज्य की सीमा से जुड़े क्षेत्र में प्रस्तावित है। परियोजना के जरिए बिजली उत्पादन के साथ जल संसाधनों का बेहतर उपयोग और क्षेत्रीय विकास की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

परियोजना के निर्माण से आसपास के क्षेत्रों में सड़क, बिजली, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास को भी गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।

करीब 5,000 लोगों के विस्थापन की चुनौती

किशाऊ परियोजना के बड़े लाभों के साथ इससे जुड़ी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। परियोजना के निर्माण के लिए करीब 17 गांवों के लगभग 5,000 लोगों के प्रभावित या विस्थापित होने की बात सामने आई है।

ऐसे में परियोजना को आगे बढ़ाते समय प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे, रोजगार और सामाजिक पुनर्स्थापन को लेकर पारदर्शी व्यवस्था बेहद जरूरी होगी। बड़ी जल परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की चिंताओं का समाधान परियोजना की सफलता का अहम हिस्सा माना जाता है।

1940 से 2026 तक ऐसे बढ़ी किशाऊ परियोजना की कहानी

किशाऊ परियोजना का इतिहास कई दशकों में फैला हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी अवधारणा 1940 के आसपास सामने आई। इसके बाद 1940 के दशक में परियोजना स्थल के सर्वेक्षण की कवायद हुई, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ सका।

इसके बाद 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सर्वेक्षण दोबारा शुरू किया गया और प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की दिशा में काम हुआ। बाद में परियोजना को पंचवर्षीय योजना में भी शामिल किया गया।

1996 में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई, लेकिन पर्यावरणीय और अन्य तकनीकी तथा प्रशासनिक कारणों से परियोजना को आगे बढ़ाने में कठिनाई बनी रही।

2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। इसके बावजूद राज्यों के बीच पानी और लागत के बंटवारे से जुड़े मुद्दे बने रहे।

इसके बाद 2014 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच सहमति, 2015 में समझौता और 2017 में दोनों राज्यों के संयुक्त उद्यम के तहत किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड के गठन जैसे कदम उठाए गए।

2018 में पर्यावरण एवं वन से संबंधित मंजूरी की प्रक्रिया में प्रगति हुई और बाद में संशोधित डीपीआर तैयार करने का निर्णय लिया गया। 2025 में संशोधित डीपीआर तैयार होने के बाद परियोजना को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश तेज हुई।

फिर 16 जून 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में छह राज्यों के बीच महत्वपूर्ण सहमति बनी। इसी बैठक में परियोजना के जल घटक की लागत में 90 फीसदी केंद्रीय सहायता और बाकी 10 फीसदी राज्यों द्वारा वहन करने की व्यवस्था पर सहमति बनी।

अब 15 सितंबर 2026 का MoU इस लंबे सफर का एक और बड़ा पड़ाव बन गया है।

अब आगे क्या होगा?

MoU पर सहमति के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी दिलाना है। केंद्र सरकार के अनुसार समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा।

कैबिनेट की मंजूरी, आगे की तकनीकी और वित्तीय प्रक्रियाएं, पर्यावरणीय तथा अन्य आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद निर्माण की दिशा में वास्तविक काम आगे बढ़ सकेगा।

यानी छह राज्यों के बीच MoU होना परियोजना के लिए बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन बांध का निर्माण शुरू होने से पहले अभी कई प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं।

यमुना के लिए भी अहम मानी जा रही परियोजना

किशाऊ बांध परियोजना को लेकर केंद्र सरकार का एक बड़ा उद्देश्य ऊपरी यमुना बेसिन में जल प्रबंधन को मजबूत करना और यमुना नदी में बेहतर जल प्रवाह सुनिश्चित करना भी है। जून की बैठक के बाद केंद्र ने इसे यमुना के पुनर्जीवन से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण कदम बताया था।

अगर परियोजना निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में इसका असर केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। सिंचाई, पेयजल, जल भंडारण और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

कुल मिलाकर, किशाऊ परियोजना के लिए 15 सितंबर 2026 का दिन बेहद महत्वपूर्ण बन गया है। करीब आठ दशकों से अलग-अलग कारणों से अटकी इस महत्वाकांक्षी योजना को अब छह राज्यों की सहमति और केंद्र की पहल से नई दिशा मिली है। हालांकि असली परीक्षा अब MoU के बाद शुरू होगी—केंद्रीय मंजूरी, वित्तीय व्यवस्था, पर्यावरणीय प्रक्रियाएं और प्रभावित परिवारों का पुनर्वास पूरा होने के बाद ही यह ऐतिहासिक परियोजना जमीन पर आकार ले सकेगी।

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