देहरादून की पहचान रही बासमती खेती पर शहरीकरण की मार, रायपुर में तेजी से घटे खेत; 45 गांवों के 160 किसानों और 75 हेक्टेयर जमीन के सहारे देहरादूनी बासमती टाइप-3 को बचाने में जुटा कृषि विभाग
देहरादून। अपनी अनूठी खुशबू, लंबे दाने, लाजवाब स्वाद और विशिष्ट गुणवत्ता के लिए दुनिया भर में पहचान रखने वाली देहरादून की बासमती आज अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। कभी दून घाटी की उपजाऊ जमीन पर दूर-दूर तक फैले धान के खेत यहां की कृषि परंपरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक पहचान का अहम हिस्सा हुआ करते थे। रायपुर, माजरा, सहसपुर, विकासनगर और डोईवाला जैसे क्षेत्रों में बासमती की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी। लेकिन बदलते समय के साथ इन खेतों की तस्वीर भी बदलती चली गई। जहां कभी धान की बालियां हवा के साथ लहराती थीं, वहां अब बहुमंजिला इमारतें, आवासीय कॉलोनियां, सड़कें और कंक्रीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं।
दून में तेजी से बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने खेती की जमीन पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका सबसे अधिक असर उन पारंपरिक फसलों पर पड़ा है, जिनकी गुणवत्ता स्थानीय जलवायु, मिट्टी और खेती के पुराने तरीकों से जुड़ी रही है। देहरादून की बासमती भी इसी बदलाव का शिकार हुई है। उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में देहरादूनी बासमती के खेती क्षेत्र में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा केवल खेती के घटते रकबे को नहीं दिखाता, बल्कि उस कृषि विरासत के कमजोर पड़ने की कहानी भी कहता है, जिसने कभी देहरादून को एक अलग पहचान दिलाई थी।
अब हालात ऐसे हैं कि रायपुर जैसे इलाकों में भी बासमती की खेती करने वाले किसान गिने-चुने रह गए हैं। हालांकि, कुछ किसान इस पारंपरिक फसल को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। वे न केवल अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती जारी रखे हुए हैं, बल्कि नए क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने, जैविक खेती अपनाने और सीधे ग्राहकों तक उत्पाद पहुंचाने के विकल्प भी तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ कृषि विभाग ने भी देहरादून बासमती टाइप-3 के उत्पादन और संवर्धन के लिए वर्ष 2026-27 में कार्यक्रम शुरू किया है। इस पहल के तहत 45 गांवों के 160 किसानों को शामिल करते हुए 75 हेक्टेयर क्षेत्र में बासमती की खेती को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है।
कभी दून की शान थी बासमती, अब खेत बचाना सबसे बड़ी चुनौती
देहरादून की बासमती का नाम आते ही उसकी विशिष्ट खुशबू और स्वाद की चर्चा होती है। यह चावल केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि दून घाटी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यहां की स्थानीय परिस्थितियों में विकसित हुई बासमती की अपनी खास विशेषताएं रही हैं। यही वजह है कि लंबे समय तक इसकी मांग और प्रतिष्ठा बनी रही।
लेकिन किसी भी पारंपरिक फसल की तरह बासमती का भविष्य भी खेती के लिए उपलब्ध जमीन पर निर्भर करता है। जब खेत आवासीय भूखंडों में बदलने लगते हैं, तो उत्पादन का क्षेत्र लगातार घटता जाता है। देहरादून में पिछले कुछ दशकों के दौरान शहरी विस्तार ने कृषि भूमि के स्वरूप को काफी प्रभावित किया है। रायपुर इसका एक प्रमुख उदाहरण है। कभी यहां धान की खेती के लिए बड़े हिस्से में जमीन उपलब्ध थी, लेकिन अब खेती के बीच-बीच में मकान और कॉलोनियां नजर आने लगी हैं।
समस्या केवल खेतों के आकार तक सीमित नहीं है। खेती का रकबा घटने से उत्पादन की कुल मात्रा प्रभावित होती है। किसानों के लिए खेती को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाए रखना मुश्किल हो सकता है और नई पीढ़ी का रुझान भी खेती से दूसरे व्यवसायों की ओर बढ़ सकता है। ऐसे में बासमती की पारंपरिक खेती को बचाने के लिए सिर्फ बीज उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए खेती की जमीन को सुरक्षित रखने, किसानों को उचित मूल्य दिलाने और उत्पाद के लिए मजबूत बाजार तैयार करने की जरूरत भी है।
30 साल से बासमती उगा रहा किसान परिवार, रायपुर में पांच एकड़ जमीन पर जारी है खेती
देहरादून में बासमती की खेती के सामने खड़ी चुनौतियों के बीच रायपुर निवासी किसान आशीष राजवंशी एक ऐसे किसान के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बदलते हालात के बावजूद खेती से अपना रिश्ता बनाए रखा है। आशीष पिछले करीब तीन दशक से देहरादून बासमती की खेती से जुड़े हैं। उनके परिवार ने वर्षों से खेती की जमीन को बचाकर रखा है और इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वे आज भी बासमती का उत्पादन कर रहे हैं।
आशीष राजवंशी के मुताबिक, वर्तमान में वे रायपुर में लगभग पांच एकड़ जमीन पर देहरादून बासमती उगा रहे हैं। इसके अतिरिक्त विकासनगर और सहसपुर क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से लगभग 20 से 25 एकड़ में बासमती की खेती की जा रही है। इस तरह उनके स्तर पर कुल मिलाकर करीब 30 एकड़ क्षेत्र में इस पारंपरिक चावल का उत्पादन हो रहा है।
यह उदाहरण बताता है कि यदि किसान के पास खेती का अनुभव, उत्पादन की योजना और बाजार तक पहुंच बनाने की इच्छाशक्ति हो, तो घटते कृषि क्षेत्र के बीच भी इस फसल को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि, रायपुर में खेती का रकबा बढ़ाना आसान नहीं है। शहरी विस्तार और जमीन के बदलते इस्तेमाल के कारण यहां उपलब्ध कृषि भूमि सीमित होती जा रही है।
आशीष का प्रयास केवल धान उगाने तक सीमित नहीं है। वे देहरादून बासमती को अपने ब्रांड के माध्यम से बाजार तक पहुंचाने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि किसान को अपने उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी पहचान और बिक्री की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। इससे उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की दूरी कम हो सकती है तथा किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
अफगानिस्तान से जुड़ी बताई जाती है दून की बासमती की कहानी
देहरादून बासमती की पहचान केवल इसके स्वाद और सुगंध तक सीमित नहीं है। इसके इतिहास को लेकर भी स्थानीय स्तर पर कई दिलचस्प बातें बताई जाती हैं। रायपुर निवासी किसान जय किशोर राजवंशी के मुताबिक, उनके परिवार में लगभग 1960 के आसपास से बासमती की खेती होती आ रही है। उनके परिवार ने पीढ़ियों तक खेती के अनुभवों और परंपराओं को संभालकर रखा है।
स्थानीय तौर पर देहरादून में बासमती के आगमन को वर्ष 1839 के आसपास की कहानी से भी जोड़ा जाता है। इसके अफगानिस्तान से संबंध होने की चर्चा भी प्रचलित है। हालांकि, इस ऐतिहासिक दावे की पुष्टि के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रमाणों का अध्ययन जरूरी है। फिर भी स्थानीय किसानों की स्मृतियां और पीढ़ियों से चली आ रही खेती की परंपराएं इस फसल के प्रति लोगों के जुड़ाव को दर्शाती हैं।
देहरादून की बासमती की खासियत उसकी गुणवत्ता में मानी जाती है। पारंपरिक खेती के अनुभव, स्थानीय परिस्थितियां और किसानों द्वारा अपनाए जाने वाले तरीके इसकी पहचान से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि इस फसल को बचाने की चर्चा केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके पारंपरिक गुणों और गुणवत्ता को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि खेती का क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास में बीज की शुद्धता, गुणवत्ता और उत्पादन के मानकों की अनदेखी होती है, तो लंबे समय में फसल की विशिष्ट पहचान प्रभावित हो सकती है। इसलिए संरक्षण के साथ वैज्ञानिक तरीके से बीजों का रखरखाव, किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और गुणवत्ता की निगरानी भी जरूरी है।
बिचौलियों और आढ़तियों के बीच फंसती रही किसानों की कमाई
देहरादून बासमती की खेती में गिरावट की कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। खेती की जमीन कम होने के साथ-साथ किसानों के सामने अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने की चुनौती भी रही है। किसान जय किशोर राजवंशी बताते हैं कि पुराने समय में किसान जब अपना धान मंडी तक लेकर जाते थे, तो कई बार उन्हें लागत और मेहनत के अनुपात में पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता था।
कृषि उत्पादन में किसान को बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, खेत की तैयारी और कटाई जैसे कई खर्च उठाने पड़ते हैं। इसके बावजूद यदि बाजार में उसे अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता, तो खेती की आर्थिक उपयोगिता प्रभावित होती है। छोटे किसानों के लिए यह स्थिति और मुश्किल हो सकती है, क्योंकि उनके पास उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने, बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाने या बाजार में कीमत को लेकर बातचीत करने के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
पारंपरिक मंडी व्यवस्था में बिचौलियों और आढ़तियों की भूमिका को लेकर किसानों की शिकायतें भी इसी समस्या से जुड़ी हैं। किसानों का कहना है कि उत्पादन करने वाले व्यक्ति को अंतिम बिक्री मूल्य का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। हालांकि, हर बाजार और व्यापार व्यवस्था में लागत, परिवहन, भंडारण और बिक्री से जुड़े अलग-अलग खर्च भी होते हैं। ऐसे में किसानों की आय बढ़ाने के लिए पारदर्शी मूल्य व्यवस्था और बेहतर विपणन विकल्पों का विकास महत्वपूर्ण है।
इसी दिशा में कुछ किसान अब सीधे ग्राहकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी उपज की बिक्री सीधे उपभोक्ताओं को करते हैं या जैविक उत्पाद बेचने वाली दुकानों के माध्यम से बाजार तक पहुंच बनाते हैं। इस मॉडल में किसान अपने उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषताओं को सीधे ग्राहक के सामने रख सकता है।
जय किशोर राजवंशी भी सीधे बिक्री के महत्व पर जोर देते हैं। उनका मानना है कि यदि किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य मिलने लगे, तो बासमती जैसी पारंपरिक फसलों की खेती को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना आसान हो सकता है।
खेती के साथ ब्रांडिंग जरूरी, तभी बढ़ सकती है किसान की आमदनी
आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में केवल अच्छी फसल उगाना ही पर्याप्त नहीं है। उत्पाद की गुणवत्ता के साथ उसकी पहचान, पैकेजिंग, भरोसे और बिक्री की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। देहरादून बासमती के मामले में यह बात विशेष रूप से मायने रखती है, क्योंकि इसकी विशिष्ट सुगंध और पारंपरिक पहचान को बाजार में एक अलग स्थान दिलाया जा सकता है।
किसान आशीष राजवंशी इसी सोच के साथ देहरादून बासमती को ब्रांड के रूप में बाजार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके मुताबिक, यदि किसान केवल अपनी फसल मंडी में बेचने तक सीमित रहता है, तो उसकी आमदनी बाजार में उपलब्ध विकल्पों और खरीद व्यवस्था पर निर्भर रह सकती है। इसके विपरीत, जब किसान अपनी उपज की पहचान बनाता है और ग्राहकों से सीधा संपर्क स्थापित करता है, तो उसके पास अपने उत्पाद की विशेषताओं को सामने रखने का अवसर होता है।
ब्रांडिंग के जरिए उपभोक्ताओं को यह बताया जा सकता है कि चावल कहां उगाया गया है, उसका उत्पादन किस प्रकार हुआ है और उसकी गुणवत्ता की विशेषताएं क्या हैं। इसके लिए सही जानकारी, पारदर्शी लेबलिंग और गुणवत्ता के अनुरूप दावे करना जरूरी है। यदि उत्पाद जैविक प्रमाणित है, तो उससे संबंधित प्रमाणन और मानकों का पालन भी आवश्यक है।
सीधी बिक्री के अपने फायदे हैं, लेकिन इसके लिए किसानों को कई व्यवस्थाएं भी विकसित करनी पड़ती हैं। इनमें पैकेजिंग, भंडारण, परिवहन, ग्राहकों तक डिलीवरी, भुगतान और बिक्री के बाद भरोसा बनाए रखना शामिल है। छोटे किसान अकेले इन सभी कामों को करना चाहें, तो उनके सामने खर्च और समय की चुनौती आ सकती है। इसलिए किसान समूहों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय उद्यमों के माध्यम से सामूहिक विपणन की व्यवस्था भी उपयोगी साबित हो सकती है।
देहरादून बासमती के लिए ऐसा मॉडल किसानों को अपनी उपज की पहचान बनाने में मदद कर सकता है। साथ ही, उपभोक्ताओं को भी स्थानीय कृषि विरासत से जुड़े उत्पाद खरीदने का अवसर मिल सकता है।
सीमित उत्पादन के कारण बड़े निर्यात बाजार तक पहुंचना मुश्किल
देहरादून बासमती की गुणवत्ता और बाजार की संभावनाओं के बावजूद इसका उत्पादन क्षेत्र सीमित होना एक बड़ी चुनौती है। बड़े निर्यात बाजारों में लगातार आपूर्ति की जरूरत होती है। खरीदारों को एक निश्चित मात्रा में, तय गुणवत्ता और निर्धारित मानकों के अनुरूप उत्पाद चाहिए होता है। यदि उत्पादन बहुत कम है या हर खेप की गुणवत्ता में अंतर है, तो बड़े स्तर पर आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
आशीष राजवंशी के मुताबिक, देहरादून में खेती का रकबा सीमित होने के कारण बड़े निर्यात बाजार की जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में बासमती उपलब्ध कराना आसान नहीं है। उनके अनुसार, वे विदेशों में मौजूद ग्राहकों तक बिजनेस-टू-कस्टमर यानी बी2सी मॉडल के माध्यम से भी बासमती पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
बी2सी मॉडल का अर्थ है कि कारोबार के तहत उत्पाद सीधे अंतिम ग्राहक तक पहुंचाया जाए। इस व्यवस्था में बड़े थोक खरीदारों के बजाय व्यक्तिगत ग्राहकों से संपर्क स्थापित करने का अवसर मिलता है। हालांकि, विदेशों में उत्पाद भेजने के लिए संबंधित देश के आयात नियमों, खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं, दस्तावेजों, पैकेजिंग और परिवहन से जुड़ी शर्तों का पालन करना जरूरी होता है।
आशीष के मुताबिक, उनके फार्म को देखने के लिए नीदरलैंड और न्यूजीलैंड से भी लोग आ चुके हैं। उनका दावा है कि विदेशी आगंतुकों ने यहां की जैविक खेती की पद्धतियों को समझने में रुचि दिखाई और स्थानीय तौर-तरीकों के बारे में जानकारी ली।
विदेशी ग्राहकों और आगंतुकों की रुचि संभावित बाजार के लिहाज से सकारात्मक संकेत हो सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर निर्यात के लिए केवल रुचि पर्याप्त नहीं है। इसके लिए निरंतर उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, बाजार की मांग और प्रमाणन की आवश्यकताओं को पूरा करना भी जरूरी है।
जैविक प्रमाणन भी जरूरी, लेकिन प्रक्रिया आसान नहीं
देहरादून बासमती को जैविक उत्पाद के रूप में बाजार में स्थापित करने के प्रयासों के साथ प्रमाणन का विषय भी जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जैविक उत्पाद बेचने के लिए संबंधित बाजार के नियमों के अनुरूप प्रमाणन और दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है। भारत में जैविक उत्पादन और निर्यात के लिए राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम यानी एनपीओपी (NPOP) महत्वपूर्ण व्यवस्था है।
अमेरिकी बाजार के लिए जैविक उत्पादों पर राष्ट्रीय जैविक कार्यक्रम यानी एनओपी (NOP) के नियम लागू होते हैं। इन दोनों व्यवस्थाओं के नियम, प्रमाणन और अनुपालन संबंधी आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए निर्यात की योजना बनाने वाले किसानों और कारोबारियों के लिए यह समझना जरूरी है कि वे किस देश में उत्पाद भेजना चाहते हैं और वहां किन मानकों का पालन करना होगा।
आशीष राजवंशी के मुताबिक, बड़े स्तर पर निर्यात के लिए बासमती की खेती का क्षेत्र बढ़ाने के साथ जैविक प्रमाणन की प्रक्रिया पूरी करना भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्रमाणन केवल एक बार दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया नहीं है। इसमें उत्पादन पद्धति, खेतों का रिकॉर्ड, इस्तेमाल किए जाने वाले इनपुट, उपज का रखरखाव और अन्य निर्धारित मानकों का पालन करना पड़ सकता है।
किसानों के लिए इस प्रक्रिया को आसान बनाने में सरकारी विभागों, कृषि संस्थानों और प्रमाणन से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि छोटे किसानों को समूह के रूप में तकनीकी सहायता, रिकॉर्ड रखने का प्रशिक्षण और प्रमाणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए, तो वे बाजार की आवश्यकताओं को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
हालांकि, जैविक खेती और प्रमाणन को बढ़ावा देते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि किसान पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े। प्रमाणन, भंडारण और विपणन से जुड़ी लागत का उचित आकलन करके ही किसी मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है।
कृषि विभाग की पहल: 45 गांवों के 160 किसानों को जोड़ने की योजना
देहरादून बासमती की घटती खेती को देखते हुए कृषि विभाग ने वर्ष 2026-27 में इसके उत्पादन और संवर्धन के लिए कार्यक्रम शुरू किया है। विभाग के मुताबिक, इस पहल में सहसपुर, डोईवाला, रायपुर और विकासनगर क्षेत्र शामिल किए गए हैं। कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 45 गांवों के 160 किसानों का चयन किया गया है और 75 हेक्टेयर क्षेत्र को इसके दायरे में लिया गया है।
इस पहल का उद्देश्य केवल खेती का रकबा बढ़ाना नहीं, बल्कि देहरादून बासमती टाइप-3 की गुणवत्ता को बनाए रखते हुए उसके उत्पादन को आगे बढ़ाना भी है। कार्यक्रम के तहत किसानों के लिए 10 प्रशिक्षण और बैठकें आयोजित की गई हैं। इसके अतिरिक्त बीज की उपलब्धता को बेहतर बनाने के लिए सीड बैंक स्थापित करने की जानकारी भी दी गई है।
कृषि विभाग की ओर से किसानों को खेती की बेहतर तकनीकों, उत्पादन संबंधी मानकों और जैविक पद्धतियों के बारे में जानकारी देने के प्रयास किए जा रहे हैं। किसी पारंपरिक फसल को संरक्षित करने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता विशेष महत्व रखती है। यदि किसानों को उपयुक्त बीज समय पर उपलब्ध हों और उन्हें खेती के सही तरीकों की जानकारी मिले, तो उत्पादन और गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, इस कार्यक्रम का वास्तविक प्रभाव जानने के लिए आने वाले समय में खेती के क्षेत्रफल, उत्पादन, किसानों की आय और फसल की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों का आकलन करना जरूरी होगा। केवल चयनित किसानों और क्षेत्रफल की संख्या से यह तय नहीं किया जा सकता कि पारंपरिक खेती कितनी मजबूत हुई है। इसके लिए यह देखना होगा कि कितने किसान लगातार इस फसल की खेती जारी रखते हैं और उन्हें अपनी उपज का कितना लाभ मिलता है।
उच्च गुणवत्ता वाले बीज, प्रशिक्षण और जैविक खेती पर विभाग का जोर
जिला कृषि अधिकारी देहरादून देवेंद्र सिंह राणा के अनुसार, विभाग का ध्यान देहरादून बासमती टाइप-3 की गुणवत्ता बनाए रखते हुए उसके उत्पादन और संवर्धन पर है। इसके लिए धान उत्पादन की मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार की गई है और निर्धारित मानकों के अनुसार खेती कराने का प्रयास किया जा रहा है।
विभाग के अनुसार, उच्च गुणवत्ता वाले बीज की व्यवस्था करने के साथ जैविक खेती को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस तरह की पहल का महत्व इसलिए है, क्योंकि बासमती की पहचान केवल उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसके विशिष्ट गुणों से भी जुड़ी है।
कृषि विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, एनपीओपी प्रमाणन से संबंधित प्रक्रिया में उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद का सहयोग लिया जा रहा है। किसानों को हरी खाद के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए निशुल्क मूंग उपलब्ध कराने की जानकारी भी दी गई है। इसके साथ कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के माध्यम से गांवों में किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया है।
हरी खाद का उपयोग मिट्टी की उर्वरता को बेहतर बनाने वाली खेती की पद्धतियों में शामिल है। उपयुक्त परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और पोषक तत्वों के प्रबंधन में सहायता कर सकता है। हालांकि, इसकी उपयोगिता खेत की स्थिति, मौसम, फसल चक्र और स्थानीय कृषि जरूरतों पर निर्भर करती है।
विकासनगर क्षेत्र में किसानों द्वारा तैयार जैविक खाद के इस्तेमाल से बासमती की नर्सरी तैयार करने और अन्य कृषि गतिविधियों को आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जगतपुर, सहसपुर और अंबाड़ी सहित विकासनगर क्षेत्र में बुवाई से जुड़ी गतिविधियां भी इस पहल का हिस्सा बताई गई हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि सरकारी स्तर पर देहरादून बासमती को बचाने के लिए बीज, तकनीकी मार्गदर्शन, जैविक खेती और प्रमाणन को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इन प्रयासों को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए किसानों की निरंतर भागीदारी और खेती की जमीन का संरक्षण सबसे अहम रहेगा।
रायपुर से गांवों की ओर बढ़ रही खेती, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग बन रहा विकल्प
देहरादून के शहरी हिस्सों में खेती की जमीन सीमित होने के कारण कुछ किसान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के विकल्प तलाश रहे हैं। आशीष राजवंशी का सहसपुर और विकासनगर क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से खेती करना इसी बदलाव का उदाहरण है।
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत किसान और संबंधित कारोबारी या खरीदार आपसी सहमति से उत्पादन की कुछ शर्तें तय कर सकते हैं। इस व्यवस्था में खेती का क्षेत्र, फसल की गुणवत्ता, उत्पादन के तरीके और खरीद से संबंधित विषयों पर पहले से चर्चा की जा सकती है। यदि समझौता पारदर्शी हो और किसानों के हितों की रक्षा करे, तो इससे उत्पादन और विपणन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस मॉडल में भी कुछ सावधानियां जरूरी हैं। किसान को यह स्पष्ट होना चाहिए कि उपज किस कीमत पर खरीदी जाएगी, गुणवत्ता के मानक क्या होंगे और किसी विवाद की स्थिति में समाधान का तरीका क्या होगा। लिखित समझौते और पारदर्शी शर्तों से दोनों पक्षों के बीच भरोसा बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
देहरादून बासमती के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का विस्तार उत्पादन की निरंतरता बढ़ाने में उपयोगी हो सकता है। लेकिन इसके साथ स्थानीय किस्म की पहचान, बीज की गुणवत्ता और निर्धारित उत्पादन मानकों को बनाए रखना भी आवश्यक होगा। यदि अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ता है, तो सभी किसानों को एक समान तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना और उपज की गुणवत्ता पर निगरानी रखना महत्वपूर्ण होगा।
किसानों के उत्पादों को एक मंच पर लाने की तैयारी
आशीष राजवंशी अपने ‘नॉर्थ इंडिया ऑर्गेनिक’ ब्रांड के माध्यम से देहरादून बासमती को बाजार तक पहुंचाने के साथ उत्तराखंड के दूसरे किसानों के उत्पादों को भी जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि किसानों की उपज को सीधे बाजार से जोड़ने की व्यवस्था विकसित की जाए, तो खेती को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।
उत्तराखंड में कई प्रकार के स्थानीय कृषि उत्पाद हैं, जिनकी पहचान क्षेत्र विशेष की जलवायु, परंपरा और उत्पादन पद्धतियों से जुड़ी है। यदि इन उत्पादों को व्यवस्थित तरीके से बाजार तक पहुंचाया जाए, तो किसानों को नए ग्राहकों से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।
इसके लिए किसानों को एक साझा मंच पर लाना, उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना, सही जानकारी के साथ पैकेजिंग करना और बिक्री की नियमित व्यवस्था तैयार करना आवश्यक होगा। छोटे किसानों के लिए डिजिटल माध्यमों और स्थानीय दुकानों के जरिए ग्राहकों तक पहुंच बनाने के विकल्प भी उपयोगी हो सकते हैं।
लेकिन किसी भी ब्रांड की सफलता के लिए उपभोक्ता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है। उत्पाद के बारे में किए गए दावे वास्तविक गुणवत्ता और प्रमाणों के अनुरूप होने चाहिए। यदि जैविक उत्पाद का दावा किया जा रहा है, तो संबंधित नियमों और प्रमाणन की आवश्यकताओं का पालन भी जरूरी है।
देहरादून बासमती के मामले में एक मजबूत ब्रांड स्थानीय कृषि विरासत को नई पहचान दिला सकता है। इससे उपभोक्ताओं को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि वे केवल चावल नहीं, बल्कि एक विशिष्ट क्षेत्र से जुड़ा पारंपरिक कृषि उत्पाद खरीद रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: क्या सरकारी प्रयास बचा पाएंगे दून की कृषि विरासत?
देहरादून बासमती को बचाने की कोशिशें ऐसे समय में हो रही हैं, जब शहर का विस्तार लगातार जारी है। एक ओर कृषि विभाग 45 गांवों के 160 किसानों और 75 हेक्टेयर क्षेत्र के माध्यम से उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में खेती की जमीन का इस्तेमाल बदल रहा है।
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। यदि खेती की जमीन लगातार कम होती रही, तो उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं कितनी दूर तक सफल हो पाएंगी? बीज की व्यवस्था, किसानों का प्रशिक्षण और जैविक प्रमाणन निश्चित रूप से उपयोगी कदम हैं, लेकिन इनका प्रभाव तभी व्यापक हो सकेगा, जब खेती के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध रहेगी।
इसके लिए कृषि भूमि के संरक्षण, भूमि उपयोग से संबंधित नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन और किसानों को खेती से बेहतर आय दिलाने के उपायों पर भी ध्यान देना होगा। खेती को लाभकारी बनाए बिना किसानों से केवल परंपरा बचाने की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसे आर्थिक विकल्प चाहिए, जिनसे परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें और अगली पीढ़ी भी खेती से जुड़ने के लिए प्रेरित हो।
देहरादून बासमती के संरक्षण में कृषि विभाग, किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, स्थानीय संस्थाओं और बाजार से जुड़े लोगों की साझा भूमिका हो सकती है। यदि उत्पादन की गुणवत्ता बनाए रखते हुए किसानों को बेहतर मूल्य, तकनीकी सहयोग और बाजार तक पहुंच मिलती है, तो इस पारंपरिक फसल के लिए नई संभावनाएं बन सकती हैं।
कंक्रीट के बीच बची उम्मीद: खेत बचेंगे, तभी महकेगी दून की बासमती
देहरादून की बासमती की कहानी केवल एक फसल के घटते उत्पादन की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें एक तेजी से विकसित होता शहर अपनी कृषि विरासत को बचाने की चुनौती का सामना कर रहा है। रायपुर में बचे हुए खेत, दशकों से खेती कर रहे किसान और ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के प्रयास इस बात की याद दिलाते हैं कि पारंपरिक खेती को पूरी तरह समाप्त मान लेना अभी सही नहीं होगा।
आशीष राजवंशी और जय किशोर राजवंशी जैसे किसान अपनी मेहनत और अनुभव के जरिए इस विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। कृषि विभाग की पहल भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब जरूरत है कि सरकारी कार्यक्रमों का लाभ किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे और खेती की जमीन को बचाने के सवाल को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए।
देहरादून बासमती को भविष्य में मजबूत पहचान दिलाने के लिए तीन बातें निर्णायक होंगी—खेती की जमीन का संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और किसानों को उचित बाजार मूल्य। इसके साथ जैविक खेती, प्रमाणन और ब्रांडिंग के प्रयास इस फसल को नए बाजारों तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन इन सभी प्रयासों की बुनियाद खेत ही हैं। यदि खेत नहीं बचेंगे, तो बीज, प्रशिक्षण और ब्रांडिंग की योजनाएं भी सीमित प्रभाव तक सिमट सकती हैं। दून की बासमती की असली खुशबू तभी बरकरार रहेगी, जब शहर के विकास के साथ उसकी कृषि पहचान को भी जगह मिलेगी।
आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देहरादून में कितनी बासमती पैदा हो रही है। सवाल यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कितने खेत बचेंगे, कितने किसान इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे और क्या दून अपनी इस अनमोल कृषि विरासत को कंक्रीट के बढ़ते विस्तार के बीच सुरक्षित रख पाएगा? इसका जवाब आने वाले वर्षों में सरकारी प्रयासों, किसानों की आर्थिक स्थिति और जमीन के संरक्षण के लिए उठाए जाने वाले कदमों से तय होगा।
