नैनीताल: न्याय की चौखट पर जब जघन्य अपराधों के मुकदमे पहुँचते हैं, तो अदालतें केवल प्रक्रियात्मक तर्कों को नहीं, बल्कि अपराध की भयावहता और समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव को भी कसौटी पर परखती हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुड़की के चर्चित जघन्य हत्याकांड के मामले में ऐसा ही कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य आरोपी जैद कुरैशी और अनस कुरैशी की नियमित जमानत याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सिर्फ इस आधार पर कि मामले के अन्य सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, मुख्य आरोपियों को ‘समानता का लाभ’ (Benefit of Parity) नहीं दिया जा सकता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित सत्र न्यायालय को मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने और बिना किसी बाहरी प्रभाव के मामले का त्वरित निपटारा करने का सख्त निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
घटना हरिद्वार जिले के रुड़की कोतवाली क्षेत्र की है, जहाँ एक योजनाबद्ध और नृशंस तरीके से हत्याकांड को अंजाम दिया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह अपराध छह लोगों के एक समूह द्वारा पूर्व-निर्धारित इरादे (Pre-meditated intention) से किया गया था। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 103 (हत्या) सहित अन्य संगीन धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था।
मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस ने मुख्य आरोपी जैद कुरैशी और अनस कुरैशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। दोनों आरोपी 10 जुलाई 2025 से लगातार सलाखों के पीछे बंद हैं।
बचाव पक्ष की दलीलें: पोस्टमार्टम रिपोर्ट और समानता का आधार
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपियों के वरिष्ठ वकीलों ने अदालत के समक्ष मुख्य रूप से दो प्रमुख आधार रखे:
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चिकित्सा साक्ष्य और बरामदगी में विरोधाभास: बचाव पक्ष का तर्क था कि पुलिस ने आरोपियों के पास से धारदार हथियार (तबाल और चाकू) बरामद होने का दावा किया है। जबकि मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण किसी ‘ठोस और कुंद वस्तु’ (Hard and Blunt Object) से लगी चोट बताया गया है। वकीलों के अनुसार, पुलिस की कहानी और मेडिकल रिपोर्ट में यह एक बड़ा और मौलिक विरोधाभास है, जो संदेह का लाभ देता है।
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समानता का सिद्धांत (Parity): याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि इस मामले में शामिल चार अन्य सह-आरोपियों को अदालत से पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में कानून के समानता के सिद्धांत के तहत जैद और अनस को भी राहत मिलनी चाहिए।
हाईकोर्ट का सख्त रुख: ‘लघु परीक्षण’ से अदालत का इनकार
न्यायपीठ ने बचाव पक्ष के इन दोनों तर्कों को विस्तृत सुनवाई के बाद अस्वीकार कर दिया। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने चिकित्सा साक्ष्यों में विरोधाभास के तर्क पर एक महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणी की।
अदालत का अवलोकन:
“मुकदमे के इस शुरुआती चरण में चिकित्सा साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का सूक्ष्म मूल्यांकन (Microscopic Evaluation) करना एक तरह के ‘लघु परीक्षण’ (Mini-Trial) के समान होगा। यदि हाईकोर्ट इस स्तर पर साक्ष्यों के विरोधाभास का गहराई से विश्लेषण करने लगेगा, तो इससे निचली अदालत में चल रही मूल न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि छह लोगों द्वारा मिलकर किए गए इस नृशंस अपराध में प्रत्येक आरोपी की भूमिका और मंशा अलग हो सकती है। केवल अन्य सह-आरोपियों की जमानत को ढाल बनाकर इस स्तर पर मुख्य अभियुक्तों को राहत नहीं दी जा सकती।
त्वरित सुनवाई और निष्पक्ष न्याय का निर्देश
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपियों की जमानत याचिकाओं को पूरी तरह से निरस्त करते हुए मामले की संवेदनशीलता पर जोर दिया। अदालत ने संबंधित सत्र न्यायालय (Trial Court) को स्पष्ट आदेश जारी किया कि:
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ट्रायल में तेजी: इस जघन्य हत्याकांड के सत्र परीक्षण (Session Trial) की कार्रवाई को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाए।
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समयबद्ध निपटारा: बिना किसी अनावश्यक स्थगन के मामले का त्वरित और निष्पक्ष निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
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निष्पक्षता: पूरी न्यायिक प्रक्रिया बिना किसी बाहरी प्रभाव या दबाव के पूरी की जाए।
न्याय व्यवस्था का कड़ा संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल प्रस्तुत करता है जहाँ जघन्य अपराधों में आरोपी चिकित्सा साक्ष्यों के तकनीकी विरोधाभास या सह-आरोपियों की जमानत का हवाला देकर राहत पाने की कोशिश करते हैं। कोर्ट के इस कड़े रुख से यह संदेश साफ है कि संगीन अपराधों में समाज की सुरक्षा और पीड़िता के प्रति न्याय सर्वोपरि है।
रुड़की हत्याकांड में हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब सबकी निगाहें सत्र न्यायालय में होने वाले ट्रायल पर टिक गई हैं, जहाँ साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अंतिम फैसला होना तय होगा।
